पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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**सम्बन्ध—**इस प्रकार दृश्य वस्तुओंसे चित्तकी भिन्न सत्ता सिद्ध करके अब द्रष्टा पुरुषसे भी चित्तकी भिन्न सत्ता सिद्ध करते हैं—
सदा ज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तत्प्रभोः पुरुषस्या- परिणामित्वात् ॥१८॥
'उस (चित्त) का स्वामी पुरुष परिणामी नहीं है, इसलिये चित्तकी वृत्तियाँ उसे सदा ज्ञात रहती हैं।'
**व्याख्या—**चित्त तो परिणामी है, इस कारण वह बाहरकी वस्तुओंको सदा नहीं देख सकता। जब जिस वस्तुका उसके साथ सम्बन्ध होता है, तभी उसे देखता है। किन्तु उस चित्तका स्वामी जो पुरुष है, वह अपरिणामी है। इस कारण वह उसकी वृत्तियोंको सदैव देखता रहता है। जिस समय जो वृत्ति उसमें उत्पन्न होती है और जो शान्त होती है, वे सभी उसे विदित रहती हैं ॥१८॥
**सम्बन्ध—**चित्त जिस प्रकार वस्तुका प्रकाशक है, उसी प्रकार अपना भी है। फिर चित्तसे भिन्न दूसरेको द्रष्टा माननेकी क्या आवश्यकता है ? इसपर कहते हैं—
न तत्स्वाभासं दृश्यत्वात् ॥१९॥
'वह (चित्त) स्वप्रकाश (प्रकाशस्वरूप) नहीं है, क्योंकि वह दृश्य है।'
**व्याख्या—**चित्त दृश्य है, इसलिये जड है। वह स्वप्रकाश यानी अपने-आपको जाननेवाला—प्रकाशस्वरूप नहीं है, उसमें जो चेतनता दिखलायी देती है, जिसके कारण वह किसी अंशमें चेतन कहा जाता है, वह उसमें चेतन पुरुषका प्रतिबिम्ब पड़नेसे है। जब चित्तमें