भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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कैवल्यपाद-४ १३७

व्याख्या- विद्यमान दृश्य वस्तु किसी एक चित्तकी कल्पना-मात्र नहीं है; क्योंकि यदि कल्पनामात्र मानी जाय तो जब वह चित्त उसको विषय करना (देखना) छोड़ दे, उस समय वह नहीं रहनी चाहिये। परन्तु ऐसा नहीं होता, वस्तु वैसी-की-वैसी ही विद्यमान रहती है। इससे यह सिद्ध होता है कि दीखनेवाली वस्तु किसी एक चित्तके अधीन नहीं है तथा दृश्य वस्तु चित्तसे भिन्न है और वह सच्ची है ॥१६॥

सम्बन्ध- यदि बाहरकी दृश्य वस्तु अपनी स्वतन्त्र सत्ता रखती है तो वह कभी दीखती है और कभी नहीं दीखती, इसमें क्या कारण है? इसपर कहते हैं—

तदुपरागापेक्षित्वाच्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम्॥१७॥

'चित्त, वस्तुके उपरागकी (अपनेमें उसका प्रतिबिम्ब पड़नेकी) अपेक्षावाला है, इस कारण उसके द्वारा वस्तु कभी ज्ञात और कभी अज्ञात होती है।'

व्याख्या- जिस पदार्थकी चित्तमें इन्द्रियोंकी समीपतासे परछाईं पड़ती है, उसी वस्तुको चित्त जान सकता है, अन्य वस्तुको नहीं। उसे वस्तुका ज्ञान प्राप्त करनेमें उसके उपराग (परछाईं—प्रतिबिम्ब) की अपेक्षा है। अतः जब जिस वस्तुका उसमें प्रतिबिम्ब पड़ता है, यानी इन्द्रियोंके द्वारा चित्तसे जब जिस वस्तुका सम्बन्ध होता है, उस समय वह वस्तु उसके ज्ञात है और जिस समय वह उसकी वृत्तिका विषय नहीं बनती अर्थात् चित्तमें उपरञ्जित नहीं होती, उस समय अज्ञात है ॥१७॥