पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १३६ | पातञ्जलयोगदर्शन |
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वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोर्विभक्तः पन्थाः ॥१५॥
'वस्तुकी एकतामें भी चित्तका भेद प्रत्यक्ष है, इसलिये (चित्त और उसके द्वारा देखी जानेवाली वस्तु) इन दोनोंका मार्ग अलग-अलग है।'
**व्याख्या—**एक ही वस्तुमें मनुष्योंके चित्तोंकी वृत्तियाँ अलग-अलग होती हैं अर्थात् अनेक चित्तका विषय वह एक ही वस्तु बनती है, यह प्रत्यक्ष है। इस परिस्थितिमें यदि वस्तु किसी एक चित्तकी कल्पनामात्र मानी जाय तो वह अनेक चित्तोंका विषय नहीं बन सकती। अतः सबको उसका स्वरूप नहीं दीखना चाहिये था; परन्तु ऐसा नहीं होता, वह सबको ही दीखती है। इसके सिवा यदि उसको अनेक चित्तोंकी कल्पना मानी जाय, तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि वह वस्तु भिन्न-भिन्न कालमें अनेक चित्तोंका विषय बनती हुई देखी जाती है। इस परिस्थितिमें वह कौन-से अनेक चित्तोंकी कल्पना मानी जायगी ? अतएव वस्तुकी एकता और उसे विषय करनेवाले चित्तोंकी अनेकता होनेके कारण दोनों अलग-अलग पदार्थ हैं—यह मान्यता ही समीचीन है ॥१५॥
**सम्बन्ध—**पुनः पूर्वपक्षका खण्डन करनेके लिये दूसरा सूत्र कहते हैं—
न चैकचित्ततन्त्रं वस्तु तदप्रमाणकं तदा किं स्यात् ॥१६॥
'दृश्य वस्तु किसी एक चित्तके अधीन नहीं है (क्योंकि) जब वह चित्तका विषय नहीं रहेगी, उस समय वस्तुका क्या होगा?'