पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकैवल्यपाद-४ [१३५]
ही हैं; क्योंकि गुण उन धर्मरूप समस्त भिन्न-भिन्न वस्तुओंमें धर्मी ( कारण ) रूपसे सदैव अनुगत रहते हैं, उनका कभी अभाव नहीं होता । अतः वास्तवमें किसी भी वस्तुकी सत्ताका अभाव नहीं है । गुणस्वरूपसे वह सदैव विद्यमान है, परन्तु परिणामशील होनेके कारण उसमें निरन्तर परिवर्तन होता रहता है ॥ १३ ॥
**सम्बन्ध—**यदि गुणोंका परिणाम होनेसे वास्तवमें सब कुछ गुणस्वरूप ही है तो फिर भिन्न-भिन्न स्वभाववाले तीनों गुणोंसे एक-एक वस्तुकी उत्पत्ति कैसे हो जाती है, हरेकसे अलग-अलग वस्तु होनी चाहिये थी ? इसपर कहते हैं—
परिणामैकत्वाद् वस्तुतत्त्वम् ॥ १४ ॥
'परिणामकी एकतासे वस्तुका वैसा होना सम्भव है ।'
**व्याख्या—**परस्पर भिन्न स्वभाववाले गुणोंका जब एक परिणाम होता है, सब मिल-जुलकर जब किसी एक वस्तुके रूपमें परिणत होते हैं, तब वैसा होनेमें कोई विरोध नहीं है । भिन्न-भिन्न वस्तुओंके एक परिणामसे एक वस्तुका प्रकट होना प्रत्यक्ष देखनेमें भी आता है । जैसे पृथ्वी और जल मिलकर सूर्य और चन्द्रमाकी रश्मियोंके सम्बन्धसे वृक्षके रूपमें परिणत हो जाते हैं और उसमें फिर नाना जाति, नाना आकार और नाना व्यक्तित्वका भेद हो जाता है । परन्तु वस्तुतः वे अपने धर्मियोंसे सर्वथा अभिन्न हैं, उसी प्रकार सब वस्तुएँ गुणस्वरूप ही हैं, उनसे भिन्न नहीं हैं ॥ १४ ॥
**सम्बन्ध—**जो लोग यह मानते हैं कि दृश्य कोई वस्तु नहीं है, वासनाके बलसे चित्त ही दृश्यरूपमें प्रतीत होने लग जाता है, उनकी मान्यता गलत है; क्योंकि—