पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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वासनाओंका और उनके हेतु आदिका नाश होना कैसे सम्भव है, इसपर कहते हैं—
अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्वभेदाद्धर्माणाम् ॥ १२ ॥
‘धर्मोंमें कालका भेद होता है, इस कारण जो धर्म (अविद्या, वासना, चित्त और चित्तकी वृत्तियाँ आदि) अतीत हो गये हैं और जो अनागत हैं—अभी प्रकट नहीं हुए हैं, उनका भी स्वरूपसे अस्तित्व है।’
व्याख्या—वस्तुका वास्तवमें अभाव कभी नहीं होता, वस्तुके धर्म चित्त और वासना आदि कुछ अनागत स्थितिमें रहते हैं, कुछ वर्तमान स्थितिमें और कुछ अतीत स्थितिमें। इससे यह नहीं समझना चाहिये कि जो वर्तमान हैं, उन्हींकी सत्ता है, दूसरोंकी नहीं। क्योंकि उनका स्वरूपसे अभाव नहीं होता है, अतीत और अनागत अवस्थामें वे अपने कारणमें रहते हैं, व्यक्त नहीं रहते। यह अपने कारणमें विलीन हो जाना ही उनका नाश या अभाव है; योगीका उन वासनादिके साथ सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, अतः वे योगीके पुनर्जन्ममें हेतु नहीं बन सकते ॥१२॥
सम्बन्ध—धर्मोंका असली स्वरूप क्या है, सो बतलाते हैं—,
ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः ॥ १३ ॥
‘वे समस्त धर्म व्यक्त स्थितिमें और सूक्ष्म स्थितिमें (सदैव) गुणस्वरूप ही हैं।’
व्याख्या—वे धर्म जिस समय वर्तमान हैं, उस समय भी अपने कारणरूप गुणोंसे भिन्न नहीं हैं तथा जिस समय अनागत और अतीत—इन दोनों प्रकारकी सूक्ष्म स्थितिमें हैं, तब भी गुणस्वरूप