पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकैवल्यपाद-४ | १३३
है, इससे पूर्वजन्मकी सिद्धि होती है। उस जन्ममें भी मरणभयकी व्याप्ति होनेसे जन्म-जन्मान्तरकी परम्परा अनादि सिद्ध हो जाती है। अतएव वासनाओंका अनादित्व भी अपने-आप सिद्ध हो जाता है ॥१०॥
**सम्बन्ध—**इस प्रकार यदि वासनाएँ अनादि हैं, तब तो इनका अभाव भी नहीं होता होगा, फिर पुरुषकी मुक्ति कैसे होगी, इसपर कहते हैं—
हेतुफलाश्रयालम्बनैः संगृहीतत्वादेषामभावे तदभावः ॥११॥
'हेतु, फल, आश्रय और आलम्बन—इनसे वासनाओंका संग्रह होता है, इसलिये इन (चारों) का अभाव होनेसे उन (वासनाओं) का भी (सर्वथा) अभाव हो जाता है।'
**व्याख्या—**वासनाओंका हेतु अविद्यादि क्लेश और उनके रहते हुए होनेवाले कर्म हैं। इनका फल पुनर्जन्म, आयु और भोग है। आश्रय चित्त है और शब्दादि विषय आलम्बन है। वासनाएँ इनके सम्बन्धसे ही संगृहीत हो रही हैं। जब योगसाधनोंसे इनका अभाव हो जाता है अर्थात् जब विवेकज्ञानसे अविद्याका नाश हो जाता है (योग० ४।३०), तब कर्मोंमें फल देनेकी सामर्थ्य नहीं रहती, चित्त अपने कारणमें विलीन हो जाता है (योग० ४।३४)। उपर्युक्त साधनोंके न रहनेसे विषयोंके साथ पुरुषका सम्बन्ध नहीं होता। इस प्रकार हेतु, फल, आश्रय और आलम्बन—इन चारोंका अभाव होनेसे वासनाओंका अभाव अपने-आप हो जाता है, अतः योगीका पुनर्जन्म नहीं होता ॥११॥
**सम्बन्ध—**यदि सत् वस्तुका कभी अभाव होता ही नहीं, तब