भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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१३२पातञ्जलयोगदर्शन

व्याख्या—कोई कर्म किसी एक जन्ममें किया गया है और कोई कर्म किसी दूसरे ही जन्ममें किया गया है, यह उन कर्मोंमें जन्मका व्यवधान है। इसी तरह भिन्न-भिन्न कर्मोंमें देश और कालका भी व्यवधान होता है। इस प्रकार जन्म, देश और कालका व्यवधान होते हुए भी जिस कर्मका फल प्राप्त होनेवाला है, उसके अनुसार भोगवासना उत्पन्न होनेमें कोई अड़चन नहीं पड़ती; क्योंकि स्मृति और संस्कार—ये दोनों एक ही हैं। जिस कर्मफलका उत्पादक निमित्त कारण आ जाता है, वैसी ही वासना प्रकट हो जाती है। यदि किसीको उसके पूर्वजन्मके कर्मका फल भोगनेके लिये गौकी योनि मिलनेवाली है, तो उसने गौकी योनि जब कभी पायी है, उसकी वासना प्रकट हो जायगी। भाव यह कि चाहे उस जन्मके बाद दूसरे कितने ही जन्म बीत चुके हों, कितना ही समय बीत चुका हो और वह किसी भी देशमें हुआ हो, उसकी वासना स्फुरित हो जायगी। स्मृति और संस्कारोंकी एकता होनेके कारण जो फल मिलना है, उसीके अनुकूल भोगवासना यानी स्मृति पैदा हो जाती है॥९॥

**सम्बन्ध—**यहाँ यह शङ्का होती है कि जब वासनाओंके अनुसार ही जन्म होता है और कर्मोंके अनुसार वासना होती है, तब सबसे पहले जन्म देनेवाली वासना कहाँसे आयी, इसपर कहते हैं—

तासामनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात् ॥१०॥

'वे वासनाएँ अनादि हैं, क्योंकि प्राणीमें अपने बने रहनेकी इच्छा नित्य रहती है।'

**व्याख्या—**प्रत्येक प्राणीको जीवनकी इच्छा नित्य बनी रहती है, मृत्युका भय तुरंत जन्मे हुए क्षुद्र-से-क्षुद्र जीवोंमें भी देखा जाता