पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
कैवल्यपाद-४ । १३९
बाह्य वस्तुएँ और चेतन पुरुष—इन दोनोंका प्रतिबिम्ब पड़ता है, उस समय पुरुष चित्तकी वृत्तियोंके रूपमें तद्रूप-सा हुआ रहता है (योग० १।४) और चित्त चेतन-सा प्रतीत होने लगता है; परन्तु वास्तवमें जैसे इन्द्रियाँ और शब्द आदि विषय दृश्य होनेके कारण स्वप्रकाश नहीं हैं, उसी प्रकार चित्त भी दृश्य होनेके कारण स्वप्रकाश नहीं है॥१९॥
सम्बन्ध—चित्तको स्वप्रकाश माननेमें दूसरा दोष दिखलाते हैं—
एकसमये चोभयानवधारणम् ॥२०॥
‘तथा (चित्त और उसका विषय)—इन दोनोंके स्वरूपको जानना भी एक कालमें नहीं हो सकता।’
व्याख्या—बाहरके पदार्थका चित्तमें प्रतिबिम्ब पड़ता है, तब द्रष्टा पुरुषको उस प्रतिबिम्बसहित चित्तका ज्ञान होना युक्तियुक्त है; क्योंकि वह अपरिणामी है। परन्तु चित्त अपने स्वरूपको और दृश्य पदार्थके स्वरूपको एक साथ नहीं जान सकता; क्योंकि परिणामशील होनेके कारण उसे एक ही कालमें दो ज्ञान नहीं हो सकते। अतः यही समझना चाहिये कि चित्त स्वप्रकाश नहीं है। चित्तका काम केवल बाह्य पदार्थके स्वरूपको अपने स्वामी द्रष्टा पुरुषके सामने रख देना है; फिर उसे जाननेका काम तो पुरुषका है ॥२०॥
सम्बन्ध—चित्तसे विषयका साक्षात्कार होता है और वह चित्त उस विषयसहित दूसरे चित्तसे देखा जाता है। इस प्रकार चित्तका और विषयका एक साथ ज्ञान हो जाता है, यह मान लिया जाय तो क्या हानि है ? इसपर कहते हैं—
२४० पातञ्जलयोगदर्शन
चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसङ्गः स्मृतिसङ्करश्च॥ २१॥
'एक चित्तको दूसरे चित्तका दृश्य मान लेनेपर वह चित्त फिर दूसरे चित्तका दृश्य होगा—इस प्रकार अनवस्था प्राप्त होगी और स्मृतिका भी मिश्रण हो जायगा।'
व्याख्या— इस प्रकार एक चित्तको दूसरे चित्तका दृश्य मान लेनेसे एक तो अनवस्था दोष आता है, दूसरे स्मृतिके सङ्कर हो जानेका दोष आता है; क्योंकि एक चित्तने तो किसी विषयको जाना, दूसरेने उस विषयसहित चित्तको जाना, इसी प्रकार दूसरेको तीसरेने, तीसरेको चौथेने, इस तरह चलता रहनेपर तो एक वस्तुका ज्ञान भी कभी समाप्त नहीं होगा, यह अनवस्था दोष आवेगा और उन अनेक ज्ञानोंकी एक साथ स्मृति होनेपर यह निर्णय नहीं हो सकेगा कि कौन-से ज्ञानका क्या स्वरूप है, स्मृतिका मिश्रण हो जायगा, सो यह किसीके अनुभवकी बात नहीं है। सब कोई ऐसा ही स्मरण करते हैं कि अमुक पदार्थको मैंने जाना था। ऐसा कोई नहीं कहता कि अमुक पदार्थको, उसके ज्ञानको, फिर उसके ज्ञानसहित ज्ञानको, फिर उसके भी ज्ञानसहित ज्ञानको मैंने जाना था—इत्यादि। अतः चित्तसे भिन्न द्रष्टाको मानना ही युक्तिसङ्गत है॥
सम्बन्ध— चित्त स्वप्रकाश भी नहीं है और दूसरे चित्तका विषय भी नहीं है तो फिर यह बतलाना चाहिये कि चित्तका द्रष्टा कौन है; क्योंकि पुरुष तो असङ्ग और निर्विकार है, वह किसीका द्रष्टा और भोक्ता कैसे हो सकता है, इसपर कहते हैं—
कैवल्यपाद-४
चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम् ॥२२॥
'यद्यपि चेतन शक्ति (पुरुष) क्रियासे रहित और असङ्ग है, तो भी तदाकार हो जानेपर उसे अपनी बुद्धिका (चित्तका) ज्ञान होता है।'
व्याख्या—चेतन पुरुष निर्विकार, अपरिणामी, क्रियाशून्य और असङ्ग है, इसमें कोई सन्देह नहीं; परन्तु विकारशील नाना प्रकारके दृश्य पदार्थोंके प्रतिबिम्बसे तदाकार हुए चित्तके सम्बन्धसे जब वह चित्तके आकारवाला-सा हो जाता है (योग० १।४), उस समय उसे वृत्तियोंसहित बुद्धिका ज्ञान होता है। अतः उसे अपनी बुद्धि और बुद्धिकी वृत्तियोंका ज्ञाता और भोक्ता कहा जाता है। वास्तवमें तो पुरुष न ज्ञाता ही है और न भोक्ता ही, वह तो सर्वथा निर्विकार, असङ्ग और स्वप्रकाश चेतनमात्र है। भाव यह है कि चेतनके उपरागसे उपराञ्जित हुई बुद्धिका केवल अनुकरण करनेवाला-सा होनेके कारण ही चेतनको ज्ञाता कहा जाता है ॥२२॥
सम्बन्ध—ऐसा किस कारणसे होता है, यह बतलाते हैं—
द्रष्टृदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम् ॥२३॥
'द्रष्टा और दृश्य—इन दोनोंसे रँगा हुआ चित्त सब अर्थवाला हो जाता है।'
व्याख्या—यह चित्त जब दृश्य पदार्थसे रँगा हुआ अपने स्वरूपके सहित द्रष्टाका विषय (दृश्य) बनकर उससे सम्बन्धित होता है, तब द्रष्टा और दृश्य—इन दोनोंके रंगमें रँग जाता है अर्थात् उन दोनोंका प्रतिबिम्ब इसमें पड़नेके कारण यह
१४२ पातञ्जलयोगदर्शन
दोनोंका आकार धारण कर लेता है और इसका निजी रूप भी वर्तमान रहता ही है, इस कारण यह चित्त ही सब अर्थवाला हो जाता है यानी दृश्य पदार्थके रूपवाला, द्रष्टा पुरुषके रूपवाला और अपने रूपवाला—इस प्रकार सर्वरूपवाला हो जाता है।
इसे इस प्रकार समझना चाहिये—
( १ ) चित्ततत्त्व या बुद्धितत्त्व जो कुछ कहिये—यह तीनों गुणोंका पहला और सात्त्विक परिणाम है। यह क्रियाशील, परिणामी और जड है, किंतु सात्त्विक होनेके कारण स्फटिकमणिकी भाँति उज्ज्वल है; यह चित्तका अपना रूप है।
( २ ) इसके सामने जिस समय जैसा बाह्य पदार्थ आता है अर्थात् जिस पदार्थका सम्बन्ध होता है, उसके रंगमें रँगा हुआ यह तदाकार हो जाता है, इसलिये पदार्थके रूपमें प्रतीत होता है।
( ३ ) पुरुषके साथ सम्बन्ध होनेके कारण यह द्रष्टा चेतन पुरुषके रंगमें रँगा हुआ रहता है, इसलिये यह तदाकार हुआ चेतनके रूपमें प्रतीत होने लगता है।
वास्तवमें चित्त उसमें प्रतिबिम्बित होनेवाले विषयोंसे और चेतन पुरुषसे सर्वथा भिन्न है तो भी भ्रान्तिसे उनके रूपमें प्रतीत होने लग जाता है। अतएव कई दर्शनकार तो चित्तको ही चेतन—द्रष्टा मानकर कहने लगते हैं कि चित्तसे भिन्न और कोई द्रष्टा नहीं है और दूसरे यह कहते हैं कि चित्तसे अतिरिक्त ये दीखनेवाले गौ, घट आदि और उसके कारणरूप पञ्चभूत आदि पदार्थ भी कुछ नहीं हैं; चित्त ही सब रूप होकर दिखलायी देता है।
कैवल्यपाद-४ १४३
परन्तु यह भ्रम समाधिके द्वारा पुरुषकी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जानेपर नष्ट हो जाता है ॥२३॥
**सम्बन्ध—**अब चित्तसे भिन्न द्रष्टा पुरुषकी सत्ताको दृढ़ करने-के लिये दूसरा हेतु बतलाते हैं—
तदसंख्येयवासनाभिश्चित्रमपि परार्थं संहत्यकारित्वात् ॥ २४॥
‘वह (चित्त) असंख्येय वासनाओंसे चित्रित होनेपर भी दूसरेके लिये है; क्योंकि यह संहत्यकारी (मिल-जुलकर कार्य करनेवाला) है।’
**व्याख्या—**जो वस्तु बहुत पदार्थोंसे मिल-जुलकर कार्यमें समर्थ होती है, वह संहत्यकारी कहलाती है—जैसे मकान, भोजन आदि। ऐसी वस्तु अपनेसे भिन्न किसी दूसरेके लिये ही हुआ करती है, अपने लिये नहीं; अतः वह परार्थ कहलाती है। यह चित्त भी सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंके मिश्रणसे उत्पन्न है तथा बाह्य पदार्थ और इन्द्रियोंके संयोगसे उनसे मिल-जुलकर कार्य करनेमें समर्थ होता है; अतः यह अपने लिये नहीं है, द्रष्टा पुरुषके लिये है तथा उसीके भोग और अपवर्गके सम्पादनार्थ यह नाना वासनाओंसे चित्रित है, अपने लिये नहीं।
भाव यह है कि यद्यपि चित्तमें ही सब बाह्य पदार्थोंके चित्र पड़ते हैं और वह अगणित वासनाओंसे रँगा हुआ है तो भी वह स्वयंप्रकाश और द्रष्टा नहीं है; क्योंकि वह बाह्य पदार्थ और इन्द्रिय आदिसे मिल-जुलकर काम करनेवाला है, अतः दूसरेके लिये है ॥२४॥
| १४४ | पातञ्जलयोगदर्शन |
|---|
**सम्बन्ध—**यहाँतक चित्त और आत्मा—इन दोनोंकी भिन्नता-का युक्तियाँद्वारा प्रतिपादन किया; किन्तु युक्तियोंसे तो आत्माका स्वरूप सामान्य भावसे ही समझमें आता है, उसके स्वरूपका विशेष ज्ञान तो समाधिद्वारा ही हो सकता है। अतः समाधिमें होनेवाले विवेकज्ञानद्वारा जब योगी आत्मस्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन कर लेता है, तब उसकी क्या पहचान है, यह बतलाते हैं—
विशेषदर्शिन आत्मभावभावनाविनिवृत्तिः ॥ २५॥
( समाधिर्जनित विवेकज्ञानके द्वारा ) चित्त और आत्माके भेदको प्रत्यक्ष कर लेनेवाले योगीकी आत्मभावविषयक भावना सर्वथा निवृत्त हो जाती है।
**व्याख्या—**अपने स्वरूपको जाननेके लिये जो इस प्रकारके संकल्प होते हैं कि मैं कौन हूँ, कैसा हूँ—इत्यादि, इसका नाम आत्मभावभावना अर्थात् आत्मज्ञानके विषयका चिन्तन है। यह जबतक मनुष्यको आत्माके स्वरूपका ज्ञान नहीं होता, तबतक ऊँचे-से-ऊँचे साधकमें भी विद्यमान रहती है। परंतु जिसने विवेक-ज्ञानद्वारा इस भेदको भलीभाँति समझ लिया है कि शरीर और चित्त आदिसे आत्मा भिन्न है, जिसे अपने स्वरूपका संशयरहित प्रत्यक्ष अनुभव हो गया है, उसकी उपर्युक्त आत्मभावभावना सर्वथा मिट जाती है। यही उसकी पहचान है ॥२५॥
**सम्बन्ध—**उस समय उस योगीके चित्तकी कैसी स्थिति रहती है, यह बतलाते हैं—
कैवल्यपाद-४ १४५
तदा विवेकिनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम् ॥ २६ ॥
'उस समय योगीका चित्त विवेकमें झुका हुआ और कैवल्यके अभिमुख हो जाता है।'
**व्याख्या—**अज्ञान-अवस्थामें साधारण मनुष्योंका चित्त अज्ञानमें निमग्न और विषयपरायण अर्थात् विषयोंके अभिमुख रहता है। परन्तु जब विवेकज्ञानका उदय हो जाता है, उस समय योगीका चित्त निःसार संसारके विषयोंकी ओर नहीं जाता, उनसे सर्वथा विरक्त हो जाता है और उस विवेकज्ञानमें निरन्तर बहता है तथा कैवल्यके अभिमुख हो जाता है यानी अपने कारणमें विलीन होना आरम्भ कर देता है। क्योंकि चित्तका अपने कारणमें विलीन हो जाना और द्रष्टाका स्वरूपमें प्रतिष्ठित हो जाना—यही कैवल्य है (योग० ४।३४) ॥२६॥
**सम्बन्ध—**यदि योगीका चित्त विवेकज्ञानमें झुका हुआ रहता है तथा अपने कारणमें विलीन होने लगता है तो फिर व्युत्थान-अवस्थामें उसकी दूसरी वृत्तियाँ कैसे होती होंगी, इसपर कहते हैं—
तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः ॥ २७ ॥
'उस (समाधि) के अन्तरालमें दूसरे पदार्थोंका ज्ञान पूर्वसंस्कारोंसे होता है।'
**व्याख्या—**विवेकज्ञानमें निमग्न हुए चित्तमें व्युत्थान-अवस्थाओंके समय जो अन्य वस्तुओंकी प्रतीतिका व्यवहार देखनेमें आता है, वह दग्धबीजके सदृश विद्यमान पूर्वसंस्कारोंसे देखनेमें आता है ॥२७॥
**सम्बन्ध—**उन संस्कारोंका सर्वथा नाश कब और कैसे होता है, इस जिज्ञासापर कहते हैं—
पा० यो० द० १०—
१४६ पातञ्जलयोगदर्शन
हानमेषां क्लेशवदुक्तम् ॥२८॥
'इन संस्कारोंका विनाश क्लेशोंकी भाँति कहा गया है।'
**व्याख्या—**दग्ध हुए बीजके सदृश जो सूक्ष्म क्लेश हैं, उनका अभाव जैसे प्रतिप्रसवसे अर्थात् कारणमें कार्यके लयसे बतलाया है (योग० २ । १०), उसी प्रकार इनका भी समझ लेना चाहिये। जबतक किसी भी परिस्थितिमें चित्त वर्तमान है, तबतक संस्कारोंका सर्वथा नाश नहीं होता, उनका नाश तो चित्तके अपने कारण गुणोंमें विलीन होनेपर उसके साथ ही होता है। परन्तु भूने हुए बीजके सदृश ज्ञानरूप अग्निसे जलाये हुए संस्कार विद्यमान रहकर भी पुनर्जन्मके हेतु नहीं बन सकते। अतः उनके कारण होनेवाला पदार्थोंका ज्ञान नये संस्कारोंका उत्पादक नहीं है ॥२८॥
**सम्बन्ध—**विवेकज्ञान प्राप्त होनेके बाद क्या होता है, इस जिज्ञासापर कहते हैं—
प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्याते-
र्धर्ममेघः समाधिः ॥२९॥
'जिस योगीका विवेकज्ञानकी महिमामें भी वैराग्य हो जाता है, उसका विवेकज्ञान सर्वथा प्रकाशमान रहनेके कारण उसको धर्ममेघ समाधि प्राप्त हो जाती है।'
**व्याख्या—**जब विवेकज्ञान उदय होता है, तब योगीके चित्तमें अत्यन्त स्वच्छता आ जाती है। अतः उसमें विलक्षण शक्ति आ जाती है, उस समय योगी सर्वज्ञ हो जाता है (योग० ३ । ४९)।
कैवल्यपाद-४ [१४७]
ऐसी सामर्थ्य प्राप्त होनेपर भी जो योगी उस सामर्थ्यका उपभोग नहीं करता, सर्वज्ञतारूप ऐश्वर्यमें आसक्त नहीं होता, उससे सर्वथा विरक्त हो जाता है, तब उसके विवेकज्ञानमें किसी प्रकारका अन्तराय (विघ्न) नहीं पड़ सकता, वह निरन्तर उदित (प्रकाशमान) रहता है, इसलिये तत्काल ही उस योगीको धर्ममेघ समाधि प्राप्त हो जाती है ॥२९॥
सम्बन्ध—उस धर्ममेघ समाधिसे क्या होता है, इसपर कहते हैं—
ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः ॥३०॥
‘उस (धर्ममेघ समाधि) से क्लेश और कर्मोंका सर्वथा नाश हो जाता है ।’
व्याख्या—उक्त प्रकारसे जब योगीकी धर्ममेघ समाधि सिद्ध हो जाती है, तब उस योगीके अविद्यादि पाँचों क्लेश तथा शुक्ल, कृष्ण और मिश्रित—ऐसे तीनों प्रकारके कर्मसंस्कार समूल नष्ट हो जाते हैं । अतः वह योगी जीवन्मुक्त कहलाता है ॥३०॥
सम्बन्ध—उस समय योगीके ज्ञानका क्या स्वरूप रहता है; यह बतलाते हैं—
तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्या-
ज्ज्ञेयमल्पम् ॥३१॥
‘उस समय जिसके सब प्रकारके परदे और मल हट चुके हैं, ऐसा ज्ञान अनन्त (सीमारहित) हो जाता है, इस कारण ज्ञेय पदार्थ अल्प हो जाते हैं ।’
| १४८ | पातञ्जलयोगदर्शन |
|---|
व्याख्या—विवेक-ज्ञानकी प्राप्तिके पहले ज्ञानको सीमाबद्ध करने-वाले जितने भी अविद्या आदि परदे रहते हैं एवं उसमें जितना भी कर्म-संस्काररूपमें संग्रह किया हुआ मल रहता है, वे सब-के-सब उपर्युक्त धर्ममेघ समाधिमें नष्ट हो जाते हैं। इस कारण योगीका ज्ञान अनन्त—सीमाराहित हो जाता है, तब दुनियाके जितने भी ज्ञेय पदार्थ हैं, वे ऐसे अल्प हो जाते हैं, जिस प्रकार आकाशमें जुगनू (खद्योत); उस समय उस सिद्ध और मुक्त योगीसे कोई भी तत्त्व अज्ञात नहीं रह सकता ॥३१॥
सम्बन्ध—यहाँ यह प्रश्न उठता है कि तीनों गुण परिणामशील हैं, अतः उनका परिणाम अवश्यम्भावी है, फिर वे योगीके लिये पुनर्जन्म देनेवाले क्यों नहीं होते, इसपर कहते हैं—
ततः कृतार्थानां परिणामक्रमसमाप्तिर्गुणानाम् ॥३२॥
'उसके बाद अपने कामको पूरा कर चुकनेवाले गुणोंके परिणामक्रमकी (परिणामसम्बन्धी सिलसिलेकी) समाप्ति हो जाती है।'
व्याख्या—जब योगीको धर्ममेघ समाधिकी प्राप्ति हो जाती है, तब उसके लिये गुणोंका कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता, उनका काम, जो पुरुषको भोग और अपवर्ग देना है, पूरा हो जाता है; इस कारण उनका जो निरन्तर परिवर्तन होते रहनारूप परिणामक्रम है, वह उस योगीके लिये समाप्त हो जाता है। अतः वे भावी शरीरका निर्माण नहीं कर सकते ॥३२॥
कैवल्यपाद-४ १४९
सम्बन्ध—प्रसङ्गवश क्रमका स्वरूप बतलाते हैं—
क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः क्रमः ॥३३॥
‘जो क्षणोंका प्रतियोगी है और परिणामके अन्तमें जिसका स्वरूप समझमें आता है, वह क्रम है।’
व्याख्या—कोई भी वस्तु जब किसी एक रूपसे दूसरे रूपमें बदलती है या एक रूपमें रहती हुई भी पुरानी होती चली जाती है, तब वह उसका परिणाम किसी एक दिनमें, एक घड़ीमें या एक पलकमें नहीं हो जाता; उसमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता है, परंतु जाननेमें नहीं आता। उस वस्तुका दूसरा परिणाम पूर्ण होनेसे यह अनुमानद्वारा जाना जाता है कि यह एक साथ नहीं बदली है, क्रमसे बदलती रही है (योग० ३। १५ और ५२ की टीकामें भी क्रमका वर्णन आया है)। इस प्रकार क्रमका ज्ञान परिणामके अन्तमें होनेसे उसे यहाँ ‘परिणामापरान्तनिर्ग्राह्य’ कहा है और प्रत्येक क्षणसे इसका सम्बन्ध है। एक क्षणके बाद दूसरा क्षण, उसके बाद तीसरा क्षण—इस तरह क्षणोंके प्रवाहमें जो पूर्वापरका ज्ञापक (जनानेमें निमित्त) है, उसीको ‘क्रम’ कहते हैं। अतः इसको क्षणप्रतियोगी कहा गया है। क्षणप्रतियोगीका शब्दार्थ यह भी किया जा सकता है कि जो क्षणोंका प्रतियोगी यानी विभाजक (विभाग करनेवाला) है, वह क्रम है ॥३३॥
सम्बन्ध—पहले बत्तीसवें सूत्रमें गुणोंके परिणामक्रमकी समाप्ति-को कैवल्य नाम दिया गया है, उक्त कैवल्यके स्वरूपका प्रतिपादन करके इस शास्त्रकी समाप्ति करते हैं—
| १५० | पातञ्जलयोगदर्शन |
|---|
पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तेरिति ॥३४॥
'जिनका पुरुषके लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं रहा, ऐसे गुणोंका अपने कारणमें विलीन हो जाना कैवल्य है अथवा (यों कहिये कि) द्रष्टाका अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित हो जाना (कैवल्य) है।'
व्याख्या—गुणोंकी प्रवृत्ति पुरुषके भोग और अपवर्गके सम्पादन करनेके लिये है। इसी कामको पूरा करनेके लिये वे बुद्धि, अहंकार, तन्मात्रा, मन, इन्द्रियाँ और शब्दादि विषयोंके आकारमें परिणत होते हैं। जिस पुरुषके लिये वे गुण भोग भुगताकर अपवर्ग (मुक्ति) सम्पादन कर देते हैं, उसके लिये उनका कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता; तब वे अपने प्रयोजनको पूरा कर चुकनेवाले कार्य और कारणरूपमें विभक्त हुए गुण प्रतिलोमपरिणामको प्राप्त होकर अपने कारणमें विलीन हो जाते हैं। यही गुणोंका कैवल्य अर्थात् पुरुषसे अलग हो जाना है; और उन गुणोंके साथ पुरुषका जो अनादिसिद्ध अविद्याकृत संयोग था, उसका अभाव हो जानेपर अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित हो जाना, यह पुरुषका कैवल्य अर्थात् प्रकृतिसे सर्वथा अलग हो जाना है ॥३४॥
५. योगदर्शन वर्णानुक्रमणिका (परिशिष्ट)
श्रीहरिः
योगदर्शनकी वर्णानुक्रमणिका
| पाद | सूत्र | पृष्ठ | |
|---|---|---|---|
| [ अ ] | |||
| अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्वभेदाद्धर्माणाम् | ४ | १२ | १३४ |
| अथ योगानुशासनम् | १ | १ | १ |
| अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या | २ | ५ | ४४ |
| अनुभूतविषयासंप्रमोषः स्मृतिः | १ | ११ | ९ |
| अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोधः | २ | ३९ | ७२ |
| अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा | १ | १० | ८ |
| अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः | १ | १२ | ९ |
| अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः | २ | ३ | ४२ |
| अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् | २ | ४ | ४३ |
| अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् | २ | ३७ | ७१ |
| अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः | २ | ३५ | ७० |
| अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः | २ | ३० | ६५ |
| [ ई ] | |||
| ईश्वरप्रणिधानाद्वा | १ | २३ | १९ |
( १५२ )
| पाद | सूत्र | पृष्ठ | |
|---|---|---|---|
| [ उ ] | |||
| उदानजयाज्जलपङ्ककण्टकादिष्वसङ्ग उत्क्रान्तिश्च | ३ | ३९ | १०९ |
| [ ऋ ] | |||
| ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा ... | १ | ४८ | ३७ |
| [ ए ] | |||
| एकसमये चोभयानवधारणम् ... | ४ | २० | १३९ |
| एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता | १ | ४४ | ३५ |
| एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः | ३ | १३ | ९० |
| [ क ] | |||
| कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिः ... | ३ | ३० | १०४ |
| कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम् ... | ४ | ७ | १३० |
| क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतुः ... | ३ | १५ | ९४ |
| कायरूपसंयमात्तद्ग्राह्यशक्तिस्तम्भे चक्षुःप्रकाशा-संप्रयोगेऽन्तर्धानम् ... | ३ | २१ | ९९ |
| कायाकाशयोः सम्बन्धसंयमाल्लघुतूलसमापत्तेश्चाकाशगमनम् ... | ३ | ४२ | ११२ |
| कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः ... | २ | ४३ | ७४ |
| कूर्मनाड्यां स्थैर्यम् ... | ३ | ३१ | १०४ |
| कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात् | २ | २२ | ५९ |
| क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः | १ | २४ | २० |
| क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः ... | २ | १२ | ४९ |
| क्षणतत्क्रमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानम् ... | ३ | ५२ | १२८ |
| क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः क्रमः | ४ | ३३ | १४९ |
( १५३ )
| पाद | सूत्र | पृष्ठ | |
|---|---|---|---|
| क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनता-<br>समापत्तिः ... | १ | ४१ | ३१ |
[ ग ]
| ग्रहणस्वरूपास्मितानव्यार्थवत्त्वसंयमादिन्द्रियजयः | ३ | ४७ | ११७ |
|---|
[ च ]
| चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम् ... | ३ | २७ | १०३ |
|---|---|---|---|
| चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसङ्गः स्मृतिसंकरश्च | ४ | २१ | १४० |
| चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम् | ४ | २२ | १४१ |
[ ज ]
| जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजाः सिद्धयः ... | ४ | १ | १२५ |
|---|---|---|---|
| जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्यं स्मृतिसंस्कारयो-<br>रेकरूपत्वात् ... | ४ | ९ | १३१ |
| जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् | २ | ३१ | ६६ |
| जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात्तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिः | ३ | ५३ | १२३ |
| जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात् ... | ४ | २ | १२८ |
[ त ]
| तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः ... | ४ | २७ | १४५ |
|---|---|---|---|
| तज्जपस्तदर्थभावनम् ... | १ | २८ | २२ |
| तज्जयात्प्रज्ञालोकः ... | ३ | ५ | ८५ |
| तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी ... | १ | ५० | ३८ |
| ततः कृतार्थानां परिणामक्रमसमाप्तिर्गुणानाम् | ४ | ३२ | १४८ |
| ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः ... | ४ | ३० | १४७ |
( १५४ )
| पाद | सूत्र | पृष्ठ | |
|---|---|---|---|
| ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् ... | २ | ५५ | ८२ |
| ततः पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रतापरिणामः | ३ | १२ | ८९ |
| ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च | १ | २९ | २३ |
| ततः प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्वादवार्ता जायन्ते | ३ | ३६ | १०७ |
| ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभिव्यक्तिर्वासनानाम् | ४ | ८ | १३१ |
| ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् ... | २ | ५२ | ८१ |
| ततोऽणिमादिप्रादुर्भावः कायसंपत्तद्धर्मानभिघातश्च | ३ | ४५ | ११४ |
| ततो द्वन्द्वानभिघातः ... | २ | ४८ | ७७ |
| ततो मनोजवित्वं विकरणभावः प्रधानजयश्च | ३ | ४८ | ११८ |
| तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् ... | १ | १६ | १२ |
| तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः ... | १ | ३२ | २६ |
| तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ... | ३ | २ | ८३ |
| तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः ... | १ | १३ | १० |
| तत्र ध्यानजमनाशयम् ... | ४ | ६ | १३० |
| तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम् ... | १ | २५ | २० |
| तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः | १ | ४२ | ३३ |
| तदर्थ एव दृश्यस्याऽऽत्मा ... | २ | २१ | ५९ |
| तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य ... | ३ | ८ | ८६ |
| तदभावात्संयोगाभावो हानं तद्दृशेः कैवल्यम् | २ | २५ | ६१ |
| तदसंख्येयवासनाभिश्चित्रमपि परार्थं संहत्यकारित्वात् | ४ | २४ | १४३ |
| तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ... | १ | ३ | २ |
| तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम् ... | ४ | २६ | १४५ |
| तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेयमल्पम् | ४ | ३१ | १४७ |
| तदुपरागापेक्षित्वाच्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम् | ४ | १७ | १३७ |
| तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः | ३ | ३ | ८४ |
| तद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम् ... | ३ | ५० | १२० |
( १५५ )
| पाद | सूत्र | पृष्ठ | |
|---|---|---|---|
| तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः | २ | १ | ४० |
| तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः | २ | ४९ | ७७ |
| तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात् ... | ३ | १० | ८८ |
| तस्य भूमिषु विनियोगः ... | ३ | ६ | ८५ |
| तस्य वाचकः प्रणवः ... | १ | २७ | २१ |
| तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा ... | २ | २७ | ६३ |
| तस्य हेतुरविद्या ... | २ | २४ | ६१ |
| तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः | १ | ५१ | ३९ |
| ता एव सबीजः समाधिः ... | १ | ४६ | ३६ |
| तारकं सर्वविषयं सर्वथाविषयमक्रमं चेति विवेकजं ज्ञानम् | ३ | ५४ | १२३ |
| तासामनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात् ... | ४ | १० | १३२ |
| तीव्रसंवेगानामासन्नः ... | १ | २१ | १७ |
| ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः ... | २ | १० | ४८ |
| ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात् ... | २ | १४ | ५० |
| ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः ... | ४ | १३ | १३४ |
| ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः ... | ३ | ३७ | १०८ |
| त्रयमन्तरङ्गं पूर्वेभ्यः ... | ३ | ७ | ८५ |
| त्रयमेकत्र संयमः ... | ३ | ४ | ८४ |
[ द ]
| पाद | सूत्र | पृष्ठ | |
|---|---|---|---|
| द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः ... | २ | २० | ५८ |
| द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः ... | २ | १७ | ५५ |
| द्रष्टृदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम् ... | ४ | २३ | १४१ |
| दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः | १ | ३१ | २५ |
| दुःखानुशयी द्वेषः ... | २ | ८ | ४७ |
| दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता ... | २ | ६ | ४६ |
| दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् | १ | १५ | १२ |
( १५६ )
पाद सूत्र पृष्ठ देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ... ३ १ ८३
[ ध ]
धारणासु च योग्यता मनसः ... २ ५३ ८१ ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः ... २ ११ ४९ ध्रुवे तद्गतिज्ञानम् ... ३ २८ १०३
[ न ]
न चैकचित्ततन्त्रं वस्तु तदप्रमाणकं तदा किं स्यात् ४ १६ १३६ न च तत्सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात् ... ३ २० ९९ न तत्स्वाभासं दृश्यत्वात् ... ४ १९ १३८ नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम् ... ३ २९ १०३ निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत् ४ ३ १२८ निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात् ... ४ ४ १२९ निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः ... १ ४७ ३७
[ प ]
परमाणुपरममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः ... १ ४० ३० परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः २ १५ ५१ परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम् ... ३ १६ ९६ परिणामैकत्वाद्वस्तुतत्त्वम् ... ४ १४ १३५ पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तेरिति ... ४ ३४ १५० पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् ... १ २६ २१ प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम् २ १८ ५६ प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य ... १ ३४ २७ प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि ... १ ७ ३
( १५७ )
| पाद | सूत्र | पृष्ठ | |
|---|---|---|---|
| प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम् | ३ | १९ | ९८ |
| प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः | १ | ६ | ३ |
| प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम् | २ | ४७ | ७६ |
| प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम् | ४ | ५ | १२९ |
| प्रवृत्त्यालोकन्यासात्सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टज्ञानम् | ३ | २५ | १०२ |
| प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेर्धर्ममेघः समाधिः | ४ | २९ | १४६ |
| प्रातिभाद्वा सर्वम् | ३ | ३३ | १०५ |
[ ब ]
| पाद | सूत्र | पृष्ठ | |
|---|---|---|---|
| बन्धकारणशैथिल्यात्प्रचारसंवेदनाच्च चित्तस्य परशरीरावेशः | ३ | ३८ | १०८ |
| ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः | २ | ३८ | ७२ |
| बलेषु हस्तिबलादीनि | ३ | २४ | १०१ |
| बहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशावरणक्षयः | ३ | ४३ | ११२ |
| बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः | २ | ५० | ७८ |
| बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः | २ | ५१ | ८० |
[ भ ]
| पाद | सूत्र | पृष्ठ | |
|---|---|---|---|
| भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् | १ | १९ | १५ |
| भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात् | ३ | २६ | १०२ |
[ म ]
| पाद | सूत्र | पृष्ठ | |
|---|---|---|---|
| मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम् | ३ | ३२ | १०४ |
| मृदुमध्याधिमात्रत्वात्ततोऽपि विशेषः | १ | २२ | १८ |
| मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम् | १ | ३३ | २७ |
| मैत्र्यादिषु बलानि | ३ | २३ | १०१ |
[ य ]
| पाद | सूत्र | पृष्ठ | |
|---|---|---|---|
| यथाभिमतध्यानाद्वा | १ | ३९ | ३० |
( १५८ )
पाद सूत्र पृष्ठ
यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयो-
ऽष्टावङ्गानि ... २ २९ ६५
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ... १ २ १
योगाङ्गाननुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिरा विवेकख्यातेः २ २८ ६४
[ र ]
रूपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि कायसंपत् ... ३ ४६ ११६
[ व ]
वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोर्विभक्तः पन्थाः ... ४ १५ १३६
वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् ... २ ३३ ६८
वितर्कविचारानन्दास्मितानुगमात्संप्रज्ञातः ... १ १७ १३
वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोध-
मोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला
इति प्रतिपक्षभावनम् ... २ ३४ ६९
विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ... १ ८ ५
विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः ... १ १८ १४
विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः ... २ २६ ६२
विशेषदर्शिन आत्मभावभावनाविनिवृत्तिः ... ४ २५ १४४
विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि ... २ १९ ५७
विशोका वा ज्योतिष्मती ... १ ३६ २८
विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धनी १ ३५ २८
वीतरागविषयं वा चित्तम् ... १ ३७ २८
वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः ... १ ५ २
वृत्तिसारूप्यमितरत्र ... १ ४ २
व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्ध-
भूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः १ ३० २३