पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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| पाद | सूत्र | पृष्ठ | |
|---|---|---|---|
| ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् ... | २ | ५५ | ८२ |
| ततः पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रतापरिणामः | ३ | १२ | ८९ |
| ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च | १ | २९ | २३ |
| ततः प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्वादवार्ता जायन्ते | ३ | ३६ | १०७ |
| ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभिव्यक्तिर्वासनानाम् | ४ | ८ | १३१ |
| ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् ... | २ | ५२ | ८१ |
| ततोऽणिमादिप्रादुर्भावः कायसंपत्तद्धर्मानभिघातश्च | ३ | ४५ | ११४ |
| ततो द्वन्द्वानभिघातः ... | २ | ४८ | ७७ |
| ततो मनोजवित्वं विकरणभावः प्रधानजयश्च | ३ | ४८ | ११८ |
| तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् ... | १ | १६ | १२ |
| तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः ... | १ | ३२ | २६ |
| तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ... | ३ | २ | ८३ |
| तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः ... | १ | १३ | १० |
| तत्र ध्यानजमनाशयम् ... | ४ | ६ | १३० |
| तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम् ... | १ | २५ | २० |
| तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः | १ | ४२ | ३३ |
| तदर्थ एव दृश्यस्याऽऽत्मा ... | २ | २१ | ५९ |
| तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य ... | ३ | ८ | ८६ |
| तदभावात्संयोगाभावो हानं तद्दृशेः कैवल्यम् | २ | २५ | ६१ |
| तदसंख्येयवासनाभिश्चित्रमपि परार्थं संहत्यकारित्वात् | ४ | २४ | १४३ |
| तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ... | १ | ३ | २ |
| तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम् ... | ४ | २६ | १४५ |
| तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेयमल्पम् | ४ | ३१ | १४७ |
| तदुपरागापेक्षित्वाच्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम् | ४ | १७ | १३७ |
| तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः | ३ | ३ | ८४ |
| तद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम् ... | ३ | ५० | १२० |