पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
DevanagariHindipublished184 पृष्ठ
पृष्ठ 173, कुल 184 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 173
( १५५ )
| पाद | सूत्र | पृष्ठ | |
|---|---|---|---|
| तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः | २ | १ | ४० |
| तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः | २ | ४९ | ७७ |
| तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात् ... | ३ | १० | ८८ |
| तस्य भूमिषु विनियोगः ... | ३ | ६ | ८५ |
| तस्य वाचकः प्रणवः ... | १ | २७ | २१ |
| तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा ... | २ | २७ | ६३ |
| तस्य हेतुरविद्या ... | २ | २४ | ६१ |
| तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः | १ | ५१ | ३९ |
| ता एव सबीजः समाधिः ... | १ | ४६ | ३६ |
| तारकं सर्वविषयं सर्वथाविषयमक्रमं चेति विवेकजं ज्ञानम् | ३ | ५४ | १२३ |
| तासामनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात् ... | ४ | १० | १३२ |
| तीव्रसंवेगानामासन्नः ... | १ | २१ | १७ |
| ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः ... | २ | १० | ४८ |
| ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात् ... | २ | १४ | ५० |
| ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः ... | ४ | १३ | १३४ |
| ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः ... | ३ | ३७ | १०८ |
| त्रयमन्तरङ्गं पूर्वेभ्यः ... | ३ | ७ | ८५ |
| त्रयमेकत्र संयमः ... | ३ | ४ | ८४ |
[ द ]
| पाद | सूत्र | पृष्ठ | |
|---|---|---|---|
| द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः ... | २ | २० | ५८ |
| द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः ... | २ | १७ | ५५ |
| द्रष्टृदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम् ... | ४ | २३ | १४१ |
| दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः | १ | ३१ | २५ |
| दुःखानुशयी द्वेषः ... | २ | ८ | ४७ |
| दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता ... | २ | ६ | ४६ |
| दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् | १ | १५ | १२ |