पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
पृष्ठ 160, कुल 184 में से
संदर्भ में पढ़ें१४२ पातञ्जलयोगदर्शन
दोनोंका आकार धारण कर लेता है और इसका निजी रूप भी वर्तमान रहता ही है, इस कारण यह चित्त ही सब अर्थवाला हो जाता है यानी दृश्य पदार्थके रूपवाला, द्रष्टा पुरुषके रूपवाला और अपने रूपवाला—इस प्रकार सर्वरूपवाला हो जाता है।
इसे इस प्रकार समझना चाहिये—
( १ ) चित्ततत्त्व या बुद्धितत्त्व जो कुछ कहिये—यह तीनों गुणोंका पहला और सात्त्विक परिणाम है। यह क्रियाशील, परिणामी और जड है, किंतु सात्त्विक होनेके कारण स्फटिकमणिकी भाँति उज्ज्वल है; यह चित्तका अपना रूप है।
( २ ) इसके सामने जिस समय जैसा बाह्य पदार्थ आता है अर्थात् जिस पदार्थका सम्बन्ध होता है, उसके रंगमें रँगा हुआ यह तदाकार हो जाता है, इसलिये पदार्थके रूपमें प्रतीत होता है।
( ३ ) पुरुषके साथ सम्बन्ध होनेके कारण यह द्रष्टा चेतन पुरुषके रंगमें रँगा हुआ रहता है, इसलिये यह तदाकार हुआ चेतनके रूपमें प्रतीत होने लगता है।
वास्तवमें चित्त उसमें प्रतिबिम्बित होनेवाले विषयोंसे और चेतन पुरुषसे सर्वथा भिन्न है तो भी भ्रान्तिसे उनके रूपमें प्रतीत होने लग जाता है। अतएव कई दर्शनकार तो चित्तको ही चेतन—द्रष्टा मानकर कहने लगते हैं कि चित्तसे भिन्न और कोई द्रष्टा नहीं है और दूसरे यह कहते हैं कि चित्तसे अतिरिक्त ये दीखनेवाले गौ, घट आदि और उसके कारणरूप पञ्चभूत आदि पदार्थ भी कुछ नहीं हैं; चित्त ही सब रूप होकर दिखलायी देता है।