पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकैवल्यपाद-४
चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम् ॥२२॥
'यद्यपि चेतन शक्ति (पुरुष) क्रियासे रहित और असङ्ग है, तो भी तदाकार हो जानेपर उसे अपनी बुद्धिका (चित्तका) ज्ञान होता है।'
व्याख्या—चेतन पुरुष निर्विकार, अपरिणामी, क्रियाशून्य और असङ्ग है, इसमें कोई सन्देह नहीं; परन्तु विकारशील नाना प्रकारके दृश्य पदार्थोंके प्रतिबिम्बसे तदाकार हुए चित्तके सम्बन्धसे जब वह चित्तके आकारवाला-सा हो जाता है (योग० १।४), उस समय उसे वृत्तियोंसहित बुद्धिका ज्ञान होता है। अतः उसे अपनी बुद्धि और बुद्धिकी वृत्तियोंका ज्ञाता और भोक्ता कहा जाता है। वास्तवमें तो पुरुष न ज्ञाता ही है और न भोक्ता ही, वह तो सर्वथा निर्विकार, असङ्ग और स्वप्रकाश चेतनमात्र है। भाव यह है कि चेतनके उपरागसे उपराञ्जित हुई बुद्धिका केवल अनुकरण करनेवाला-सा होनेके कारण ही चेतनको ज्ञाता कहा जाता है ॥२२॥
सम्बन्ध—ऐसा किस कारणसे होता है, यह बतलाते हैं—
द्रष्टृदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम् ॥२३॥
'द्रष्टा और दृश्य—इन दोनोंसे रँगा हुआ चित्त सब अर्थवाला हो जाता है।'
व्याख्या—यह चित्त जब दृश्य पदार्थसे रँगा हुआ अपने स्वरूपके सहित द्रष्टाका विषय (दृश्य) बनकर उससे सम्बन्धित होता है, तब द्रष्टा और दृश्य—इन दोनोंके रंगमें रँग जाता है अर्थात् उन दोनोंका प्रतिबिम्ब इसमें पड़नेके कारण यह