पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४० पातञ्जलयोगदर्शन
चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसङ्गः स्मृतिसङ्करश्च॥ २१॥
'एक चित्तको दूसरे चित्तका दृश्य मान लेनेपर वह चित्त फिर दूसरे चित्तका दृश्य होगा—इस प्रकार अनवस्था प्राप्त होगी और स्मृतिका भी मिश्रण हो जायगा।'
व्याख्या— इस प्रकार एक चित्तको दूसरे चित्तका दृश्य मान लेनेसे एक तो अनवस्था दोष आता है, दूसरे स्मृतिके सङ्कर हो जानेका दोष आता है; क्योंकि एक चित्तने तो किसी विषयको जाना, दूसरेने उस विषयसहित चित्तको जाना, इसी प्रकार दूसरेको तीसरेने, तीसरेको चौथेने, इस तरह चलता रहनेपर तो एक वस्तुका ज्ञान भी कभी समाप्त नहीं होगा, यह अनवस्था दोष आवेगा और उन अनेक ज्ञानोंकी एक साथ स्मृति होनेपर यह निर्णय नहीं हो सकेगा कि कौन-से ज्ञानका क्या स्वरूप है, स्मृतिका मिश्रण हो जायगा, सो यह किसीके अनुभवकी बात नहीं है। सब कोई ऐसा ही स्मरण करते हैं कि अमुक पदार्थको मैंने जाना था। ऐसा कोई नहीं कहता कि अमुक पदार्थको, उसके ज्ञानको, फिर उसके ज्ञानसहित ज्ञानको, फिर उसके भी ज्ञानसहित ज्ञानको मैंने जाना था—इत्यादि। अतः चित्तसे भिन्न द्रष्टाको मानना ही युक्तिसङ्गत है॥
सम्बन्ध— चित्त स्वप्रकाश भी नहीं है और दूसरे चित्तका विषय भी नहीं है तो फिर यह बतलाना चाहिये कि चित्तका द्रष्टा कौन है; क्योंकि पुरुष तो असङ्ग और निर्विकार है, वह किसीका द्रष्टा और भोक्ता कैसे हो सकता है, इसपर कहते हैं—