पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकैवल्यपाद-४ १४३
परन्तु यह भ्रम समाधिके द्वारा पुरुषकी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जानेपर नष्ट हो जाता है ॥२३॥
**सम्बन्ध—**अब चित्तसे भिन्न द्रष्टा पुरुषकी सत्ताको दृढ़ करने-के लिये दूसरा हेतु बतलाते हैं—
तदसंख्येयवासनाभिश्चित्रमपि परार्थं संहत्यकारित्वात् ॥ २४॥
‘वह (चित्त) असंख्येय वासनाओंसे चित्रित होनेपर भी दूसरेके लिये है; क्योंकि यह संहत्यकारी (मिल-जुलकर कार्य करनेवाला) है।’
**व्याख्या—**जो वस्तु बहुत पदार्थोंसे मिल-जुलकर कार्यमें समर्थ होती है, वह संहत्यकारी कहलाती है—जैसे मकान, भोजन आदि। ऐसी वस्तु अपनेसे भिन्न किसी दूसरेके लिये ही हुआ करती है, अपने लिये नहीं; अतः वह परार्थ कहलाती है। यह चित्त भी सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंके मिश्रणसे उत्पन्न है तथा बाह्य पदार्थ और इन्द्रियोंके संयोगसे उनसे मिल-जुलकर कार्य करनेमें समर्थ होता है; अतः यह अपने लिये नहीं है, द्रष्टा पुरुषके लिये है तथा उसीके भोग और अपवर्गके सम्पादनार्थ यह नाना वासनाओंसे चित्रित है, अपने लिये नहीं।
भाव यह है कि यद्यपि चित्तमें ही सब बाह्य पदार्थोंके चित्र पड़ते हैं और वह अगणित वासनाओंसे रँगा हुआ है तो भी वह स्वयंप्रकाश और द्रष्टा नहीं है; क्योंकि वह बाह्य पदार्थ और इन्द्रिय आदिसे मिल-जुलकर काम करनेवाला है, अतः दूसरेके लिये है ॥२४॥