पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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**सम्बन्ध—**यहाँतक चित्त और आत्मा—इन दोनोंकी भिन्नता-का युक्तियाँद्वारा प्रतिपादन किया; किन्तु युक्तियोंसे तो आत्माका स्वरूप सामान्य भावसे ही समझमें आता है, उसके स्वरूपका विशेष ज्ञान तो समाधिद्वारा ही हो सकता है। अतः समाधिमें होनेवाले विवेकज्ञानद्वारा जब योगी आत्मस्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन कर लेता है, तब उसकी क्या पहचान है, यह बतलाते हैं—
विशेषदर्शिन आत्मभावभावनाविनिवृत्तिः ॥ २५॥
( समाधिर्जनित विवेकज्ञानके द्वारा ) चित्त और आत्माके भेदको प्रत्यक्ष कर लेनेवाले योगीकी आत्मभावविषयक भावना सर्वथा निवृत्त हो जाती है।
**व्याख्या—**अपने स्वरूपको जाननेके लिये जो इस प्रकारके संकल्प होते हैं कि मैं कौन हूँ, कैसा हूँ—इत्यादि, इसका नाम आत्मभावभावना अर्थात् आत्मज्ञानके विषयका चिन्तन है। यह जबतक मनुष्यको आत्माके स्वरूपका ज्ञान नहीं होता, तबतक ऊँचे-से-ऊँचे साधकमें भी विद्यमान रहती है। परंतु जिसने विवेक-ज्ञानद्वारा इस भेदको भलीभाँति समझ लिया है कि शरीर और चित्त आदिसे आत्मा भिन्न है, जिसे अपने स्वरूपका संशयरहित प्रत्यक्ष अनुभव हो गया है, उसकी उपर्युक्त आत्मभावभावना सर्वथा मिट जाती है। यही उसकी पहचान है ॥२५॥
**सम्बन्ध—**उस समय उस योगीके चित्तकी कैसी स्थिति रहती है, यह बतलाते हैं—