भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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कैवल्यपाद-४ १४५

तदा विवेकिनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम् ॥ २६ ॥

'उस समय योगीका चित्त विवेकमें झुका हुआ और कैवल्यके अभिमुख हो जाता है।'

**व्याख्या—**अज्ञान-अवस्थामें साधारण मनुष्योंका चित्त अज्ञानमें निमग्न और विषयपरायण अर्थात् विषयोंके अभिमुख रहता है। परन्तु जब विवेकज्ञानका उदय हो जाता है, उस समय योगीका चित्त निःसार संसारके विषयोंकी ओर नहीं जाता, उनसे सर्वथा विरक्त हो जाता है और उस विवेकज्ञानमें निरन्तर बहता है तथा कैवल्यके अभिमुख हो जाता है यानी अपने कारणमें विलीन होना आरम्भ कर देता है। क्योंकि चित्तका अपने कारणमें विलीन हो जाना और द्रष्टाका स्वरूपमें प्रतिष्ठित हो जाना—यही कैवल्य है (योग० ४।३४) ॥२६॥

**सम्बन्ध—**यदि योगीका चित्त विवेकज्ञानमें झुका हुआ रहता है तथा अपने कारणमें विलीन होने लगता है तो फिर व्युत्थान-अवस्थामें उसकी दूसरी वृत्तियाँ कैसे होती होंगी, इसपर कहते हैं—

तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः ॥ २७ ॥

'उस (समाधि) के अन्तरालमें दूसरे पदार्थोंका ज्ञान पूर्वसंस्कारोंसे होता है।'

**व्याख्या—**विवेकज्ञानमें निमग्न हुए चित्तमें व्युत्थान-अवस्थाओंके समय जो अन्य वस्तुओंकी प्रतीतिका व्यवहार देखनेमें आता है, वह दग्धबीजके सदृश विद्यमान पूर्वसंस्कारोंसे देखनेमें आता है ॥२७॥

**सम्बन्ध—**उन संस्कारोंका सर्वथा नाश कब और कैसे होता है, इस जिज्ञासापर कहते हैं—

पा० यो० द० १०—