पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तेरिति ॥३४॥
'जिनका पुरुषके लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं रहा, ऐसे गुणोंका अपने कारणमें विलीन हो जाना कैवल्य है अथवा (यों कहिये कि) द्रष्टाका अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित हो जाना (कैवल्य) है।'
व्याख्या—गुणोंकी प्रवृत्ति पुरुषके भोग और अपवर्गके सम्पादन करनेके लिये है। इसी कामको पूरा करनेके लिये वे बुद्धि, अहंकार, तन्मात्रा, मन, इन्द्रियाँ और शब्दादि विषयोंके आकारमें परिणत होते हैं। जिस पुरुषके लिये वे गुण भोग भुगताकर अपवर्ग (मुक्ति) सम्पादन कर देते हैं, उसके लिये उनका कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता; तब वे अपने प्रयोजनको पूरा कर चुकनेवाले कार्य और कारणरूपमें विभक्त हुए गुण प्रतिलोमपरिणामको प्राप्त होकर अपने कारणमें विलीन हो जाते हैं। यही गुणोंका कैवल्य अर्थात् पुरुषसे अलग हो जाना है; और उन गुणोंके साथ पुरुषका जो अनादिसिद्ध अविद्याकृत संयोग था, उसका अभाव हो जानेपर अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित हो जाना, यह पुरुषका कैवल्य अर्थात् प्रकृतिसे सर्वथा अलग हो जाना है ॥३४॥