पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकैवल्यपाद-४ १४९
सम्बन्ध—प्रसङ्गवश क्रमका स्वरूप बतलाते हैं—
क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः क्रमः ॥३३॥
‘जो क्षणोंका प्रतियोगी है और परिणामके अन्तमें जिसका स्वरूप समझमें आता है, वह क्रम है।’
व्याख्या—कोई भी वस्तु जब किसी एक रूपसे दूसरे रूपमें बदलती है या एक रूपमें रहती हुई भी पुरानी होती चली जाती है, तब वह उसका परिणाम किसी एक दिनमें, एक घड़ीमें या एक पलकमें नहीं हो जाता; उसमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता है, परंतु जाननेमें नहीं आता। उस वस्तुका दूसरा परिणाम पूर्ण होनेसे यह अनुमानद्वारा जाना जाता है कि यह एक साथ नहीं बदली है, क्रमसे बदलती रही है (योग० ३। १५ और ५२ की टीकामें भी क्रमका वर्णन आया है)। इस प्रकार क्रमका ज्ञान परिणामके अन्तमें होनेसे उसे यहाँ ‘परिणामापरान्तनिर्ग्राह्य’ कहा है और प्रत्येक क्षणसे इसका सम्बन्ध है। एक क्षणके बाद दूसरा क्षण, उसके बाद तीसरा क्षण—इस तरह क्षणोंके प्रवाहमें जो पूर्वापरका ज्ञापक (जनानेमें निमित्त) है, उसीको ‘क्रम’ कहते हैं। अतः इसको क्षणप्रतियोगी कहा गया है। क्षणप्रतियोगीका शब्दार्थ यह भी किया जा सकता है कि जो क्षणोंका प्रतियोगी यानी विभाजक (विभाग करनेवाला) है, वह क्रम है ॥३३॥
सम्बन्ध—पहले बत्तीसवें सूत्रमें गुणोंके परिणामक्रमकी समाप्ति-को कैवल्य नाम दिया गया है, उक्त कैवल्यके स्वरूपका प्रतिपादन करके इस शास्त्रकी समाप्ति करते हैं—