भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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१४८पातञ्जलयोगदर्शन

व्याख्या—विवेक-ज्ञानकी प्राप्तिके पहले ज्ञानको सीमाबद्ध करने-वाले जितने भी अविद्या आदि परदे रहते हैं एवं उसमें जितना भी कर्म-संस्काररूपमें संग्रह किया हुआ मल रहता है, वे सब-के-सब उपर्युक्त धर्ममेघ समाधिमें नष्ट हो जाते हैं। इस कारण योगीका ज्ञान अनन्त—सीमाराहित हो जाता है, तब दुनियाके जितने भी ज्ञेय पदार्थ हैं, वे ऐसे अल्प हो जाते हैं, जिस प्रकार आकाशमें जुगनू (खद्योत); उस समय उस सिद्ध और मुक्त योगीसे कोई भी तत्त्व अज्ञात नहीं रह सकता ॥३१॥

सम्बन्ध—यहाँ यह प्रश्न उठता है कि तीनों गुण परिणामशील हैं, अतः उनका परिणाम अवश्यम्भावी है, फिर वे योगीके लिये पुनर्जन्म देनेवाले क्यों नहीं होते, इसपर कहते हैं—

ततः कृतार्थानां परिणामक्रमसमाप्तिर्गुणानाम् ॥३२॥

'उसके बाद अपने कामको पूरा कर चुकनेवाले गुणोंके परिणामक्रमकी (परिणामसम्बन्धी सिलसिलेकी) समाप्ति हो जाती है।'

व्याख्या—जब योगीको धर्ममेघ समाधिकी प्राप्ति हो जाती है, तब उसके लिये गुणोंका कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता, उनका काम, जो पुरुषको भोग और अपवर्ग देना है, पूरा हो जाता है; इस कारण उनका जो निरन्तर परिवर्तन होते रहनारूप परिणामक्रम है, वह उस योगीके लिये समाप्त हो जाता है। अतः वे भावी शरीरका निर्माण नहीं कर सकते ॥३२॥