पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकैवल्यपाद-४ [१४७]
ऐसी सामर्थ्य प्राप्त होनेपर भी जो योगी उस सामर्थ्यका उपभोग नहीं करता, सर्वज्ञतारूप ऐश्वर्यमें आसक्त नहीं होता, उससे सर्वथा विरक्त हो जाता है, तब उसके विवेकज्ञानमें किसी प्रकारका अन्तराय (विघ्न) नहीं पड़ सकता, वह निरन्तर उदित (प्रकाशमान) रहता है, इसलिये तत्काल ही उस योगीको धर्ममेघ समाधि प्राप्त हो जाती है ॥२९॥
सम्बन्ध—उस धर्ममेघ समाधिसे क्या होता है, इसपर कहते हैं—
ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः ॥३०॥
‘उस (धर्ममेघ समाधि) से क्लेश और कर्मोंका सर्वथा नाश हो जाता है ।’
व्याख्या—उक्त प्रकारसे जब योगीकी धर्ममेघ समाधि सिद्ध हो जाती है, तब उस योगीके अविद्यादि पाँचों क्लेश तथा शुक्ल, कृष्ण और मिश्रित—ऐसे तीनों प्रकारके कर्मसंस्कार समूल नष्ट हो जाते हैं । अतः वह योगी जीवन्मुक्त कहलाता है ॥३०॥
सम्बन्ध—उस समय योगीके ज्ञानका क्या स्वरूप रहता है; यह बतलाते हैं—
तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्या-
ज्ज्ञेयमल्पम् ॥३१॥
‘उस समय जिसके सब प्रकारके परदे और मल हट चुके हैं, ऐसा ज्ञान अनन्त (सीमारहित) हो जाता है, इस कारण ज्ञेय पदार्थ अल्प हो जाते हैं ।’