पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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( ग ) भूतोंके धर्मोंसे बाधा न होना—इसका यह भाव है कि भूतोंके धर्म उस योगीके काममें बाधा नहीं डाल सकते। वह पृथ्वीके अंदर भी उसी प्रकार प्रवेश कर सकता है, जैसे हरेक मनुष्य जलमें प्रवेश कर सकता है। पृथ्वीका धर्म स्थूलभाव ( कड़ापन ) उसे बाधा नहीं पहुँचा सकता। उसपर यदि पत्थरोंकी वर्षा की जाय तो वे उसके शरीरमें आघात नहीं पहुँचा सकते। इसी तरह जलका गीलापन उसके शरीरको गला नहीं सकता, अग्नि जला नहीं सकता अर्थात् सर्दी-गर्मी-वर्षा आदि कोई भी भूतोंके धर्म उसके शरीरमें किसी प्रकारकी बाधा नहीं पहुँचा सकते।
ये सब सिद्धियाँ योगीको चौवालीसवें सूत्रके कथनानुसार भूतोंकी सब अवस्थाओंपर विजय प्राप्त कर लेनेपर मिलती हैं, यह भाव है ॥ ४५ ॥
सम्बन्ध—उक्त कायसंपत्की व्याख्या सूत्रकार स्वयं करते हैं—
रूपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि कायसंपत् ॥ ४६ ॥
‘रूप, लावण्य, बल और वज्रके समान संगठन—ये कायसंपत् ( शरीरकी सम्पदाएँ ) हैं।’
व्याख्या—अत्यन्त सुन्दर आकृति, समस्त अङ्गोंमें चमक, बलकी बहुलता तथा शरीरके समस्त अङ्गोंका वज्रकी भाँति दृढ़ और परिपूर्ण हो जाना—ये चारों शरीरसम्बन्धी सम्पदा हैं ॥ ४६ ॥
सम्बन्ध—अब मनसहित इन्द्रियोंमें की जानेवाली ग्रहण-विषयक समाधिके फलका वर्णन करते हैं—