भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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विभूतिपाद-३ ११५

व्याख्या— ( क ) ऊपर बतलायी हुई अणिमादि आठ सिद्धियोंके नाम और लक्षण इस प्रकार हैं—

( १ ) अणिमा—अणुके समान सूक्ष्मरूप धारण कर लेना। जैसे हनुमान्‌जीने सुरसाके मुखमें एवं लङ्कामें प्रवेश करते समय किया था ( वा० रामायण सुन्दर० १ । १५६; २ । ४७ )।

( २ ) लघिमा—शरीरको हल्का कर लेना। इससे जल, पङ्क और कण्टकादिसे बाधा नहीं होती ( योग० ३ । ३९ ) और आकाशमें गमन करनेकी शक्ति आ जाती है ( योग० ३ । ४२ )।

( ३ ) महिमा—शरीरको बड़ा कर लेना। जैसे हनुमान्‌जीने सुरसाके सामने किया था ( वा० रामायण सुन्दर० १ । १५४ )।

( ४ ) गरिमा—शरीरको भारी कर लेना। जैसे हनुमान्‌जीने भीमसेनके मार्गमें रुकावट डालते समय किया था ( महा० वन० १४६-१४७ वाँ अध्याय )।

( ५ ) प्राप्ति—जिस भौतिक पदार्थको चाहे, संकल्पमात्रसे ही प्राप्त कर लेना।

( ६ ) प्राकाम्य—बिना रुकावट भौतिक पदार्थसम्बन्धी इच्छाकी पूर्ति हो जाना।

( ७ ) वशित्व—पाँचों भूतोंका और तज्जन्य पदार्थोंका वशमें हो जाना।

( ८ ) ईशित्व—उन भूत और भौतिक पदार्थोंको नाना रूपोंमें उत्पन्न करनेकी और उनपर शासन करनेकी सामर्थ्य।

( ख ) कायसंपत्‌का विवरण अगले सूत्रमें आवेगा।