पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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( २ ) स्वरूपावस्था—इनके जो लक्षण हैं, वह इनकी स्वरूपावस्था है। जैसे, पृथ्वीकी मूर्त्ति, जलका गीलापन, अग्निकी उष्णता और प्रकाश, वायुकी गति और कम्पन, आकाशका अवकाश—यह इनकी स्वरूपावस्था है; क्योंकि इन्हींसे इनकी भिन्न-भिन्न सत्ताका अनुभव होता है।
( ३ ) सूक्ष्मावस्था—इनकी जो कारण-अवस्था है, जिनको तन्मात्रा और सूक्ष्म महाभूत भी कहते हैं, वे इनकी सूक्ष्म-अवस्था हैं। जैसे पृथ्वीकी गन्धतन्मात्रा, जलकी रसतन्मात्रा, अग्निकी रूपतन्मात्रा, वायुकी स्पर्शतन्मात्रा और आकाशकी शब्दतन्मात्रा।
( ४ ) अन्वय-अवस्था—पाँचों भूतोंमें जो तीनों गुणोंका स्वभाव यानी प्रकाश, क्रिया और स्थिति व्याप्त है, वह इनकी अन्वय-अवस्था है।
( ५ ) अर्थवत्त्व-अवस्था—ये पाँचों भूत पुरुषके भोग और अपवर्गके लिये हैं। यही इनकी अर्थवत्त्व ( प्रयोजनता ) अवस्था है।
इन पाँचों भूतोंकी प्रत्येक अवस्थाके क्रमसे सम्पूर्ण अवस्थाओंमें भलीभाँति संयम करके जब योगी इनको प्रत्यक्ष कर लेता है, तब योगीका इन भूतोंपर पूरा अधिकार हो जाता है ॥४४॥
सम्बन्ध—इस प्रकार जब योगी भूतोंपर विजय प्राप्त कर लेता है, तब क्या होता है, सो बतलाते हैं—
ततोऽणिमादिप्रादुर्भावः कायसंपत्तद्धर्मानभिघातश्च ४५
'उससे (भूतजयसे) अणिमादि आठ सिद्धियोंका प्रकट हो जाना, कायसम्पत्की प्राप्ति और उन भूतोंके धर्मोंसे बाधा न होना—(ये तीनों होते हैं)।'