पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविभूतिपाद-३ ११३
भावनामात्रसे होती है, तब तो कल्पित है और जब शरीरसे सम्बन्ध छोड़कर बाहर निकले हुए मनकी बाहर स्थिर स्थिति हो जाती है, तब अकल्पित होती है । कल्पित धारणाके अभ्याससे ही अकल्पित धारणा सिद्ध होती है । इसीको महाविदेहा कहते हैं, इससे योगीके ज्ञानका आवरण नष्ट हो जाता है। यह धारणा इन्द्रिय और मनकी स्वरूपावस्थामें संयम करनेसे होती है (योग० ३।४८) ॥४३॥
**सम्बन्ध—**यहाँतक नाना प्रकारके संयमोंका फलसहित वर्णन किया; अब जो पहले पादके इकतालीसवें सूत्रमें ग्राह्य, ग्रहण और ग्रहीतामें की जानेवाली सबीज समाधिके लक्षण बतलाये गये थे, उसका फल बतलानेके लिये पहले पाँच भूतोंमें और तज्जनित पदार्थोंमें की जानेवाली ग्राह्यविषयक समाधिका फल बतलाते हैं—
स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमाद्
भूतजयः ॥४४॥
‘(भूतोंकी) स्थूल, स्वरूप, सूक्ष्म, अन्वय और अर्थवत्त्व— इन पाँच प्रकारकी अवस्थाओंमें संयम करनेसे (योगी) पाँचों भूतोंपर विजय प्राप्त कर लेता है।’
**व्याख्या—**पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—ये पाँच भूत हैं । इनमेंसे हरेककी पाँच अवस्थाएँ होती हैं । जैसे—
**(१) स्थूलावस्था—**जिस रूपमें हम इनको अपनी इन्द्रियों- द्वारा अनुभव कर रहे हैं, जिनको गीतामें इन्द्रियगोचर नाम दिया है (१३।५), वे इन्द्रियोंद्वारा प्रत्यक्ष अनुभवमें आनेवाले शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध नामवाले पाँचों विषय इनकी स्थूल-अवस्था है ।
पा० यो० द० ८—