पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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कायाकाशयोः सम्बन्धसंयमाल्लघुतूलसमापत्ते-
श्चाकाशगमनम् ॥४२॥
'शरीर और आकाशके सम्बन्धमें संयम करनेसे अथवा हल्की वस्तु (रूई आदि) में संयम करनेसे आकाशमें चलनेकी शक्ति आ जाती है।'
व्याख्या—शरीर और आकाशका जो सम्बन्ध है, उसे संयमद्वारा पूर्णतया प्रत्यक्ष कर लेनेपर योगी इस तत्त्वको भलीभाँति समझ लेता है कि शरीरके अङ्ग किस प्रकार सूक्ष्म अवस्थासे स्थूल अवस्थामें परिणत होते हैं और किस प्रकार पुनः स्थूलसे सूक्ष्म किये जाते हैं। अतः वह अपने शरीरको अत्यन्त हल्का बनाकर चाहे जहाँ गमन कर सकता है। इसी तरह योगी जब किसी भी सूक्ष्म (धुनी हुई रूई या बादल आदि) वस्तुमें संयम करके तद्रूप हो जाता है, तब उससे भी उसको आकाशगमनकी योग्यता मिल जाती है ॥४२॥
सम्बन्ध—अब ज्ञानके आवरणका नाश जिस उपायसे किया जा सकता है, वह बतलाते हैं—
बहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशा-
वरणक्षयः ॥४३॥
'शरीरके बाहर अकल्पित स्थितिका नाम महाविदेहा है। उससे बुद्धिकी ज्ञानशक्तिके आवरणका क्षय हो जाता है।'
व्याख्या—शरीरके बाहर जो मनकी स्थिति है, उसको विदेह-धारणा कहते हैं, वह जब मनके शरीरमें रहते हुए ही केवल