पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविभूतिपाद-३ १११
देदीप्यमान (प्रकाशयुक्त) हो जाता है; क्योंकि जठराग्नि और समानवायुका घनिष्ठ सम्बन्ध है। अतः समानवायुको जीत लेनेपर योगी अपने शरीरमें रहनेवाले जठराग्निके आवरणको हटाकर अग्निके सदृश प्रकाशमान हो सकता है ॥४०॥
**सम्बन्ध—**पहले छत्तीसवें सूत्रमें जो छः सिद्धियाँ बतलायी गयी हैं, उनमेंसे श्रावण नामकी सिद्धिका साधन बतलाते हैं—
श्रोत्राकाशयोः सम्बन्धसंयमाद् दिव्यं श्रोत्रम् ॥४१॥
'श्रोत्र (कान) और आकाशके सम्बन्धमें संयम कर लेनेसे योगीके श्रोत्र दिव्य हो जाते हैं।'
**व्याख्या—**शब्दको ग्रहण करनेवाली श्रोत्र-इन्द्रिय अहंकारसे उत्पन्न हुई है और आकाशकी उत्पत्ति अहंकारजनित शब्दतन्मात्रा-से हुई है, अतः आकाश, शब्द और श्रोत्र-इन्द्रिय—इन तीनोंकी एकता है। इस श्रोत्र और आकाशके सम्बन्धको जब योगी संयम-द्वारा प्रत्यक्ष कर लेता है, तब उसकी श्रोत्र-इन्द्रियमें दिव्य शक्ति आ जाती है। फिर वह सूक्ष्म-से-सूक्ष्म शब्दको सुन सकता है तथा किसी वस्तुसे ढके हुए शब्दको भी सुन सकता है और जो शब्द कहीं दूर देशमें बोला जाय, उसे भी सुन सकता है; क्योंकि आकाश विभु अर्थात् सर्वव्यापी है, इस कारण उसके अंदर कहीं भी होनेवाला शब्द तत्काल ही सर्वत्र व्याप्त हो जाता है। अतः जिसकी श्रोत्र-इन्द्रिय दिव्य यानी अलौकिक हो जाती है, वह चाहे जिस शब्दको, जहाँपर वह हो, वहीं सुन सकता है ॥४१॥