पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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नाभिसे लेकर पादतलतक इसका देश है । मूत्र, विष्ठा और गर्भ आदि इसीके वेगसे नीचे उतरते हैं ।
(३) समान—हृदयसे लेकर नाभितक इसका देश है, खान-पानके रसको समस्त शरीरमें यथायोग्य पहुँचा देना इसका काम है, इसकी गति सम है ।
(४) व्यान—यह समस्त शरीरमें व्याप्त रहता हुआ ही विचरता है ।
(५) उदान—यह ऊपरकी ओर गमन करनेवाला है; कण्ठमें रहनेवाला और सिरतक गमन करनेवाला है । मृत्युके समय इसीके सहारे सूक्ष्म शरीरका गमन होता है ।
जब योगी उक्त उदान वायुपर विजय प्राप्त कर लेता है, तब उसका शरीर धुनी हुई रूईकी भाँति अत्यन्त हल्का हो जाता है, अतः पानी और कीचड़पर चलते हुए भी उसके पैर अंदर नहीं जाते, काँटे आदि भी उसके शरीरमें प्रविष्ट नहीं हो सकते । इसके सिवा, मरणकालमें उसके प्राण ब्रह्मरन्ध्र (मूर्धाके छिद्र) द्वारा निकलते हैं, इस कारण ऐसे योगीकी शुक्लमार्गसे गति होती है । उपनिषदोंमें भी उक्त ऊर्ध्वगतिका वर्णन आया है (देखिये कठ० २।३।१६) ॥३९॥
समानजयाज्ज्वलनम् ॥४०॥
'(संयमद्वारा) समान वायुको जीत लेनेसे (योगीका शरीर) दीप्तिमान् हो जाता है।'
व्याख्या—जब योगी संयमके द्वारा उपर्युक्त समानवायुको जीत लेता है, तब उसका शरीर अग्निके सदृश प्रज्वलित यानी अत्यन्त