भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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विभूतिपाद-३ १०९

**व्याख्या—**चित्तके बन्धनका कारण कर्म-संस्कार है; कर्मोंका फल भुगतानेके लिये ही यह चित्त किसी एक शरीरमें बँधे रहनेके लिये बाध्य हो जाता है। उक्त बन्धनके कारणरूप कर्म-संस्कारोंको जब मनुष्य समाधिके अभ्यासद्वारा शिथिल करके चित्तको स्वच्छ बना लेता है और साथ ही जिन-जिन मार्गोंद्वारा चित्त शरीरमें विचरता है (जाता-आता है), उन मार्गोंको और चित्तकी गतिको भी भलीभाँति जान लेता है, तब उसमें यह सामर्थ्य आ जाती है कि वह अपने चित्तको शरीरसे बाहर करके दूसरेके (मृत या जीवित) किसी भी शरीरमें प्रविष्ट कर सकता है। चित्तके साथ-साथ इन्द्रियाँ भी जहाँ चित्त जाता है, वहाँ अपने-आप चली जाती हैं ॥३८॥

उदानजयाज्जलपङ्ककण्टकादिष्वसङ्ग उत्क्रान्तिश्च ॥३९॥

'उदान वायुको जीत लेनेसे जल, कीचड़, कण्टकादिसे उसके शरीरका संयोग नहीं होता और ऊर्ध्वगति भी होती है।'

**व्याख्या—**शरीरके जीवनका आधार प्राण है, क्रियाभेदसे उसके प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान—ये पाँच नाम हैं। उनके लक्षण इस प्रकार हैं—

( १ ) प्राण—यह इन पाँचोंमें प्रधान है, इसकी गति मुख और नासिकाद्वारा होती है। नासिकाके अग्रभागसे लेकर हृदयतक शरीरमें इसका देश है।

( २ ) अपान—यह नीचेकी ओर गमन करनेवाला है,