पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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( ५ ) आस्वाद—इससे दिव्य रसका अनुभव होता है।
( ६ ) वार्ता—इससे दिव्य गन्धका अनुभव होता है ॥३६॥
**सम्बन्ध—**इन सिद्धियोंमें वैराग्य करानेके लिये कहते हैं—
ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः ॥३७॥
'वे ( उक्त छः प्रकारकी सिद्धियाँ ) समाधिकी सिद्धिमें ( पुरुषका ज्ञान प्राप्त करनेमें ) विघ्न हैं और व्युत्थानमें सिद्धियाँ हैं।'
**व्याख्या—**उक्त छः प्रकारकी सिद्धियाँ साधकके सामने आवें तो इनका त्याग कर देना चाहिये, क्योंकि ये उसके साधनमें विघ्नस्वरूप हैं। हाँ, जिसका चित्त चञ्चल है, जो साधक नहीं है, जो समाधिकी या आत्मोद्धारकी आवश्यकता नहीं समझता है, ऐसे मनुष्यको किसी कारणसे प्राप्त हो जायँ तो उसके लिये अवश्य ही ये सिद्धियाँ हैं ॥३७॥
**सम्बन्ध—**यहाँतक नाना प्रकारके संयमोंसे जो भिन्न-भिन्न ज्ञान होते हैं, उनका वर्णन पुरुषके ज्ञानपर्यन्त किया गया; अब भिन्न-भिन्न संयमोंसे जो भिन्न-भिन्न प्रकारकी क्रियाशक्तियाँ उपलब्ध होती हैं, उनका वर्णन अगले सूत्रोंमें किया जाता है—
बन्धकारणशैथिल्यात्प्रचारसंवेदनाच्च चित्तस्य परशरीरावेशः ॥३८॥
'बन्धनके कारण ( कर्म ) की शिथिलतासे और चित्तकी गतिका भलीभाँति ज्ञान होनेसे चित्तका दूसरेके शरीरमें प्रवेश ( किया जा सकता है )।'