भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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विभूतिपाद-३ १०७

यही प्रथम पादके इकतालीसवें सूत्रमें बतलायी हुई ग्रहीतृ-विषयक समाधि है। इस समाधिका ध्येय 'पुरुष' अस्मितासे सम्बन्धित होनेके कारण पहले पादके सतरहवें सूत्रमें इसको भी अस्मितानुगत समाधिके नामसे कहा है, ऐसा अनुमान किया जाता है। क्योंकि ऐसा माननेसे पूर्वापरका प्रसङ्ग ठीक बैठ जाता है तथा ग्रहीतृविषयक समाधिका निर्विचारमें अन्तर्भाव मानना भी सुसंगत हो जाता है॥३५॥

**सम्बन्ध—**उक्त संयमसे पुरुषका ज्ञान होनेके पूर्व जो सिद्धियाँ योगीके सामने आती हैं, उनका वर्णन करते हैं—

ततः प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्वादवार्ता जायन्ते ॥३६॥

'उस (स्वार्थ-संयम) से प्रातिभ, श्रावण, वेदन, आदर्श, आस्वाद और वार्ता—ये (छः सिद्धियाँ) प्रकट होती हैं।'

**व्याख्या—**ये छहों सिद्धियाँ ग्रहीतृविषयक समाधिके साधनमें लगे हुए साधकको पुरुषज्ञानके पहले प्राप्त होती हैं। इनके लक्षण इस प्रकार हैं—

(१) **प्रातिभ—**इसका वर्णन तैंतीसवें सूत्रमें आया है। इससे भूत, भविष्य और वर्तमान एवं सूक्ष्म, ढकी हुई और दूर देशमें स्थित वस्तुएँ प्रत्यक्ष हो जाती हैं।

(२) **श्रावण—**इससे दिव्य शब्द सुना जाता है।

(३) **वेदन—**इससे दिव्य स्पर्शका अनुभव होता है।

(४) **आदर्श—**इससे दिव्य रूपका दर्शन होता है।