पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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ही प्रकारके संस्कार अनेक जन्म-जन्मान्तरोंसे संगृहीत होते आ रहे हैं । उन संस्कारोंमें संयम करके उनको प्रत्यक्ष कर लेनेसे योगीको पूर्वजन्मका ज्ञान हो जाता है । जैसे अपने पूर्व संस्कारोंके साक्षात्कारसे अपने पूर्वजन्मका ज्ञान होता है, उसी प्रकार दूसरेके संस्कारोंमें संयम करनेसे उसके पूर्वजन्मका भी ज्ञान हो सकता है ॥१८॥
प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम् ॥१९॥
‘दूसरेके चित्तका ( संयमद्वारा ) साक्षात्कार कर लेनेसे दूसरेके चित्तका ज्ञान हो जाता है ।’
व्याख्या—श्रीविज्ञानभिक्षुका अर्थ है कि संयमद्वारा अपने चित्तकी वृत्तिका साक्षात्कार कर लेनेसे योगी संकल्पमात्रसे ही दूसरेके चित्तको जान लेता है कि यह कुछ चिन्तन करनेमें लग रहा है या नहीं । किंतु दूसरे टीकाकारोंने यह अर्थ स्वीकार नहीं किया है ।
इस ग्रन्थमें प्रायः चित्तकी वृत्तिविशेषको या ज्ञानको ही प्रत्यय नामसे कहा गया है । किंतु यहाँ दूसरे टीकाकारोंने प्रत्ययका अर्थ चित्तवृत्ति न लेकर चित्त लिया है; क्योंकि इस सूत्रमें उसके साक्षात्कारका फल चित्तका ज्ञान कहा है और अगले सूत्रमें वृत्ति-सहित ज्ञानका निषेध किया है तथा इस सूत्रमें यह स्पष्ट नहीं है कि किसके चित्तसाक्षात्कारका यह फल बतलाया गया है । किंतु फलमें ‘पर’ शब्दका प्रयोग देखकर साक्षात्कार भी दूसरेके ही चित्तका माना है । वास्तवमें क्या बात है, ठीक समझमें नहीं आती ॥१९॥
सम्बन्ध—उसीको स्पष्ट करते हैं—
विभूतिपाद-३ ९९
न च तत्सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात् ॥२०॥
'वह ज्ञान आलम्बनसहित नहीं होता, क्योंकि ( वैसा चित्त ) योगीके चित्तका विषय नहीं है।'
व्याख्या—चित्तके साक्षात्कारसे योगीको जो दूसरेके चित्तका ज्ञान होता है, वह केवल चित्तके स्वरूपमात्रका ही होता है, उस चित्तके आलम्बनका यानी उसका चित्त जिस वस्तुका चिन्तन कर रहा है, उसका ज्ञान नहीं होता; क्योंकि योगीके चित्तका विषय दूसरेका चित्त है, उसका आलम्बन नहीं ॥२०॥
सम्बन्ध—अब दूसरी सिद्धिका वर्णन करते हैं—
कायरूपसंयमात् तद्ग्राह्यशक्तिस्तम्भे चक्षुः- प्रकाशासंप्रयोगेऽन्तर्धानम् ॥२१॥
'शरीरके रूपमें संयम कर लेनेसे जब उसकी ग्राह्यशक्ति रोक ली जाती है, तब चक्षुके प्रकाशका उसके साथ सम्बन्ध न होनेके कारण योगी अन्तर्धान हो जाता है।'
व्याख्या—जब योगी अपने शरीरके रूपमें संयम कर लेता है, तब वह दूसरेके देखनेमें आनेवाली शरीरकी दृश्यताशक्तिका संकल्पमात्रसे अवरोध कर सकता है; उसका अवरोध कर लेनेपर दूसरोंके नेत्रोंकी प्रकाशशक्तिसे उसका सम्बन्ध नहीं होता, इस कारण उसे कोई नहीं देख सकता। इसका नाम अन्तर्धान है।
इसी तरह यदि योगी शब्दमें संयम कर लेता है तो उसके शब्दको कोई नहीं सुन सकता। यदि शरीरके स्पर्शमें संयम कर
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लेता है तो उसे कोई छू नहीं सकता—इत्यादि सिद्धियाँ भी उपलक्षण-से समझ लेनी चाहिये ॥२१॥
**सम्बन्ध—**अन्य सिद्धिका वर्णन करते हैं—
सोपक्रमं निरुपक्रमं च कर्म तत्संयमादपरान्त-
ज्ञानमरिष्टेभ्यो वा ॥२२॥
'उपक्रमसहित और उपक्रमरहित—ऐसे दो प्रकारके कर्म होते हैं। उनमें संयम कर लेनेसे (योगीको) मृत्युका ज्ञान हो जाता है अथवा अरिष्टोंसे भी (मृत्युका ज्ञान हो जाता है)।'
**व्याख्या—**जिन कर्मोंके फलस्वरूप मनुष्यकी आयुका निर्माण होता है, वे दो प्रकारके होते हैं—(१) सोपक्रम—जिनके फलका आरम्भ हो चुका है, जो कि अपना फल देनेमें लगे हुए हैं, (२) निरुपक्रम—जिनके फल-भोगका आरम्भ नहीं हुआ है। इन दोनों प्रकारके कर्मोंमें संयम करके जब मनुष्य इनको इस तरह प्रत्यक्ष कर लेता है कि कौन-कौन-से कर्म कितने अंशमें अपना फल दे चुके हैं और कौन-से कर्मोंका कितना फल-भोग बाकी है और इनकी गतिके हिसाबसे कितने कालमें दोनों प्रकारके समस्त कर्मोंकी समाप्ति हो जायगी, तब उसे अपनी मृत्युका अर्थात् शरीरनाशके समयका पूरा-पूरा ज्ञान हो जाता है।
इसके सिवा, अरिष्टोंसे अर्थात् बुरे चिह्नोंसे भी मृत्युका ज्ञान हो जाता है, परंतु यह ज्ञान प्रत्यक्ष नहीं है, अनुमान-ज्ञान है ॥२२॥
विभूतिपाद-३ १०१
मैत्र्यादिषु बलानि ॥२३॥
‘मैत्री आदि भावनाओंमें संयम करनेसे ( मैत्री आदि विषयक ) बल मिलते हैं।’
**व्याख्या—**पहले ( योग० १ । ३३ में ) मैत्री, करुणा और मुदिता—इन तीन प्रकारकी भावनाओंका वर्णन है; चौथी जो उपेक्षा है, वह भावना नहीं है, भावनाका त्याग है। उनमेंसे पहली जो सुखी मनुष्योंमें मित्रताकी भावना है, उसमें संयम करनेसे योगीको मित्रताकी सामर्थ्य प्राप्त हो जाती है अर्थात् वह सबका मित्र बनकर उनको सुख पहुँचानेमें समर्थ हो जाता है। दूसरी जो दुखी मनुष्योंमें करुणाकी भावना है, उसमें संयम करनेसे योगीको करुणाबल प्राप्त हो जाता है अर्थात् उसका स्वभाव परम दयालु हो जाता है और उसमें हरेक प्राणीके दुःखोंको दूर करनेकी सामर्थ्य आ जाती है। तीसरी जो पुण्यात्मा मनुष्योंमें मुदिताकी भावना है, उसमें संयम करनेसे मुदिताका बल प्राप्त हो जाता है अर्थात् वह ईर्ष्याके दोषसे सर्वथा शून्य हो जाता है और सदैव प्रसन्न रहता है। कोई भी परिस्थिति उसके मनमें किञ्चिन्मात्र भी चिन्ता, शोक या भयकी वृत्ति उत्पन्न नहीं कर सकती तथा वह दूसरोंको भी अपनी ही भाँति प्रसन्न बनानेमें समर्थ हो जाता है ॥२३॥
बलेषु हस्तिबलादीनि ॥२४॥
‘( भिन्न-भिन्न ) बलोंमें संयम करनेसे हाथी आदिके सदृश ( संयमके अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकारके ) बल प्राप्त होते हैं।’
**व्याख्या—**यदि वह हाथीके बलमें संयम करता है तो उसे हाथीके समान बल मिल जाता है, यदि गरुड़के बलमें संयम
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करता है तो गरुड़के समान बल मिल जाता है, यदि वायुके बलमें संयम करतां है तो वायुके समान बल मिलता है। इसी तरह जिसके बलमें संयम करता है, वैसा ही बल उसे प्राप्त हो जाता है ॥२४॥
प्रवृत्त्यालोकन्यासात् सूक्ष्मव्यवहित-
विप्रकृष्टज्ञानम् ॥२५॥
'ज्योतिष्मती प्रवृत्तिका प्रकाश डालनेसे सूक्ष्म व्यवधान-युक्त और दूर देशमें स्थित विषयोंका ज्ञान हो जाता है।'
व्याख्या—तीन प्रकारकी वस्तुओंका प्रत्यक्ष साधारणतया इन्द्रियोंसे नहीं हो सकता। एक तो जो वस्तु अत्यन्त सूक्ष्म होती है, जैसे परमाणु, महत्तत्त्व, प्रकृति आदि; दूसरी व्यवहित अर्थात् जो किसी परदेमें छिपी हो, जैसे समुद्रमें रत्न, खानमें सुवर्ण, मणि आदि; तीसरी विप्रकृष्ट अर्थात् जो दूर देशमें वर्तमान हो, जैसे हम आसाममें बैठे हैं और वस्तु मारवाड़में पड़ी है अथवा यों समझिये कि हम हिंदुस्थानमें हैं और वस्तु अमेरिकामें पड़ी है। इनमेंसे किसी भी वस्तुको जाननेके लिये जब योगी पहले पादके छत्तीसवें सूत्रमें और इस पादके पाँचवें सूत्रमें वर्णित ज्योतिष्मती अर्थात् प्रकाशवती प्रवृत्तिके प्रकाशको उसपर छोड़ता है, तब उसी समय वह योगीके प्रत्यक्ष हो जाती है ॥२५॥
भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात् ॥२६॥
'सूर्यमें संयम करनेसे समस्त लोकोंका ज्ञान हो जाता है।'
व्याख्या—पुराणोंमें चौदह भुवनोंका वर्णन आता है, उनमेंसे एक भूलोक है; उन चौदहों भुवनोंका ज्ञान सूर्यमें संयम करनेसे हो जाता है। व्यासभाष्यमें इन लोकोंका विस्तारपूर्वक वर्णन किया
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गया है; परन्तु आध्यात्मिक साधनके लिये उपयोगी न समझकर मैंने यहाँ उनका वर्णन नहीं किया है। इसके सिवा यह बात भी है कि इनके विषयका वर्णन ठीक-ठीक समझमें भी नहीं आता ॥२६॥
चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम् ॥२७॥
'चन्द्रमामें संयम करनेसे सब तारोंके व्यूहका (स्थान-विशेषका) ज्ञान हो जाता है।'
**व्याख्या—**चन्द्रमामें संयम करनेसे कौन तारा किस स्थानमें टिका है, इसका यथावत् ज्ञान हो जाता है ॥२७॥
**सम्बन्ध—**उसके बाद—
ध्रुवे तद्गतिज्ञानम् ॥२८॥
'ध्रुवतारेमें संयम करनेसे उन ताराओंकी गतिका ज्ञान हो जाता है।'
**व्याख्या—**ध्रुव तारा निश्चल है और सब ताराओंकी गतिका उससे सम्बन्ध है; अतः उसमें संयम करनेसे समस्त ताराओंकी गतिका अर्थात् कौन तारा कितने समयमें किस राशि और किस नक्षत्रपर जायगा—इसका पूरा-पूरा ज्ञान हो जाता है ॥२८॥
नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम् ॥२९॥
'नाभिचक्रमें संयम करनेसे शरीरके व्यूहका (उसकी स्थितिका) पूरा-पूरा ज्ञान हो जाता है।'
**व्याख्या—**नाभिमें स्थित जो चक्र है, जिसमें शरीरकी समस्त नाड़ियाँ गुँथी हुई हैं, उसमें संयम करनेसे शरीरके व्यूहका ज्ञान हो जाता है अर्थात् शरीरका संगठन किस प्रकार हुआ है, उसमें
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कौन-सी धातु किस प्रकार कहाँ स्थित है, इन सबका और समस्त नाड़ियोंका योगीको पूरा-पूरा ज्ञान हो जाता है ॥२९॥
कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिः ॥३०॥
'कण्ठकूपमें संयम करनेसे भूख और प्यासकी निवृत्ति हो जाती है।'
व्याख्या—जिह्वाके नीचे एक तन्तु है (जिसे जिह्वामूल भी कहते हैं), उसके नीचे कण्ठ है, उसके नीचे कूप (गड्ढा) है। उस कण्ठकूपमें संयम करनेसे भूख-प्यासकी बाधा मिट जाती है। इसमें यह कारण बतलाया जाता है कि उस कण्ठकूपसे प्राणवायु टकराती है, उसीसे भूख-प्यासकी बाधा होती है; उसमें संयम करनेके बाद वह नहीं होती ॥३०॥
कूर्मनाड्यां स्थैर्यम् ॥३१॥
'कूर्माकार नाड़ीमें संयम करनेसे स्थिरता होती है।'
व्याख्या—उक्त कूपके नीचे वक्षःस्थलमें एक कछुवेके आकार-वाली नाड़ी है, उसमें संयम करनेसे स्थिर स्थितिकी प्राप्ति हो जाती है अर्थात् चित्त और शरीर—दोनों स्थिर हो जाते हैं ॥३१॥
मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम् ॥३२॥
'मूर्धाकी ज्योतिमें संयम करनेसे सिद्ध पुरुषोंके दर्शन होते हैं।'
व्याख्या—सिरके कपालमें एक छिद्र है (इसीको ब्रह्मरन्ध्र कहते हैं) वहाँ जो प्रकाशमयी ज्योति है, उसमें संयम करनेवालेको पृथ्वी और स्वर्गलोकके बीचमें विचरनेवाले सिद्धोंके दर्शन होते हैं ॥३२॥
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प्रातिभाद्वा सर्वम् ॥३३॥
'अथवा प्रातिभ ज्ञान उत्पन्न होनेसे (बिना किसी संयमके ही) योगी पहले कही हुई सारी बातोंको जान लेता है।'
व्याख्या—जिसका वर्णन इसी पादके ३६ वें सूत्रमें है, उसका नाम प्रातिभ ज्ञान है; यह विवेकजनित ज्ञानका पूर्वरूप है। अतः जिस प्रकार सूर्यकी प्रभासे, जो कि सूर्योदयसे कुछ पहले प्रकट होती है, मनुष्य सब वस्तुओंको देख सकता है, उसी प्रकार प्रातिभ ज्ञान उत्पन्न होनेसे योगी सबको जान जाता है ॥३३॥
हृदये चित्तसंवित् ॥३४॥
'हृदयमें संयम करनेसे चित्तके स्वरूपका ज्ञान हो जाता है।'
व्याख्या—इस ब्रह्मपुर नामक हृदयदेशमें गर्त (गड्ढे) के आकारवाला कमल है, वह चित्तका स्थान है, उसमें संयम करनेसे वृत्तियोंसहित चित्तका ज्ञान हो जाता है ॥३४॥
सम्बन्ध—चित्तके स्वरूपका ज्ञान होनेसे विवेक होते ही पुरुषके स्वरूपका ज्ञान हो जाता है। अतः अगले सूत्रमें कहते हैं—
सत्त्वपुरुषयोरत्यन्तासंकीर्णयोः प्रत्ययाविशेषो भोगः परार्थात्स्वार्थसंयमात्पुरुषज्ञानम् ॥३५॥
'सत्त्व (बुद्धि) और पुरुष, जो कि दोनों परस्पर अत्यन्त भिन्न हैं (किसी प्रकार भी एकत्र होनेवाले नहीं हैं)—इन दोनोंकी प्रतीतिका जो अभेद है, वही भोग है, उसमेंसे परार्थ प्रतीतिसे भिन्न जो स्वार्थ-प्रतीति है, उसमें संयम करनेसे पुरुषका ज्ञान होता है।'
व्याख्या—बुद्धि और पुरुष—दोनों सर्वथा भिन्न हैं, इनका कोई
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मेल नहीं है; क्योंकि बुद्धि परिणामशील, जड, भोग्य और चञ्चल है एवं पुरुष अपरिणामी, चेतन, भोक्ता और असङ्ग है। तथापि अविद्याके कारण इनकी एकता-सी हो रही है, इसीका नाम अस्मिता है (योग० २।६)। इस एकताके कारण दोनोंका अलग-अलग ज्ञान नहीं होता, एक साथ मिला हुआ ज्ञान होता है, उस दशामें इस जड-बुद्धिमें (जो कि पुरुषकी चेतनतासे चेतन-सी हो रही है) जो सुख-दुःख और मोहरूप नाना प्रकारकी वृत्तियोंका उदय होता है, वह वृत्ति अविशेष (अभिन्न-मिश्रित) है; क्योंकि इससे चित्तके धर्म सुख-दुःख और मोह आदि चित्तमें प्रतिबिम्बित चैतन्य पुरुषमें अध्यारोपित होते हैं। यह अभेद-प्रतीति ही भोग है। यह अभेदरूप वृत्ति यद्यपि चित्तका धर्म है, परन्तु पुरुषके लिये है; इस कारण परार्थ है। और इसी दशामें जो इस भोगरूप वृत्तियोंसे भिन्न द्रष्टा-पुरुषके स्वरूपविषयक वृत्ति होती है, वह पौरुषेय वृत्ति स्वार्थ है, क्योंकि उसका विषय भी पुरुष है और वह है भी उसीके लिये; अतः वह परार्थ नहीं है। इस स्वार्थवृत्तिमें संयम करनेसे पुरुषका ज्ञान होता है। यद्यपि ज्ञान बुद्धिका धर्म है, अतः उस बुद्धिके धर्मरूप ज्ञानसे पुरुष नहीं जाना जाता है, किन्तु बुद्धिमें जो पुरुषका चेतन रूप प्रतिबिम्बित है, उसको दर्पणमें अपना मुख देखनेकी भाँति पुरुष देखता है। इस प्रकार उक्त संयमसे योगीको पुरुषका ज्ञान होता है।*
* यह विषय मैंने भाष्य और दूसरे-दूसरे टीकाकारोंका भाव लेकर लिखा है, परन्तु यह तर्कसे समझमें आनेवाला विषय नहीं है। अतः अनुभवी सज्जनोंको इसपर गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिये।
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यही प्रथम पादके इकतालीसवें सूत्रमें बतलायी हुई ग्रहीतृ-विषयक समाधि है। इस समाधिका ध्येय 'पुरुष' अस्मितासे सम्बन्धित होनेके कारण पहले पादके सतरहवें सूत्रमें इसको भी अस्मितानुगत समाधिके नामसे कहा है, ऐसा अनुमान किया जाता है। क्योंकि ऐसा माननेसे पूर्वापरका प्रसङ्ग ठीक बैठ जाता है तथा ग्रहीतृविषयक समाधिका निर्विचारमें अन्तर्भाव मानना भी सुसंगत हो जाता है॥३५॥
**सम्बन्ध—**उक्त संयमसे पुरुषका ज्ञान होनेके पूर्व जो सिद्धियाँ योगीके सामने आती हैं, उनका वर्णन करते हैं—
ततः प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्वादवार्ता जायन्ते ॥३६॥
'उस (स्वार्थ-संयम) से प्रातिभ, श्रावण, वेदन, आदर्श, आस्वाद और वार्ता—ये (छः सिद्धियाँ) प्रकट होती हैं।'
**व्याख्या—**ये छहों सिद्धियाँ ग्रहीतृविषयक समाधिके साधनमें लगे हुए साधकको पुरुषज्ञानके पहले प्राप्त होती हैं। इनके लक्षण इस प्रकार हैं—
(१) **प्रातिभ—**इसका वर्णन तैंतीसवें सूत्रमें आया है। इससे भूत, भविष्य और वर्तमान एवं सूक्ष्म, ढकी हुई और दूर देशमें स्थित वस्तुएँ प्रत्यक्ष हो जाती हैं।
(२) **श्रावण—**इससे दिव्य शब्द सुना जाता है।
(३) **वेदन—**इससे दिव्य स्पर्शका अनुभव होता है।
(४) **आदर्श—**इससे दिव्य रूपका दर्शन होता है।
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( ५ ) आस्वाद—इससे दिव्य रसका अनुभव होता है।
( ६ ) वार्ता—इससे दिव्य गन्धका अनुभव होता है ॥३६॥
**सम्बन्ध—**इन सिद्धियोंमें वैराग्य करानेके लिये कहते हैं—
ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः ॥३७॥
'वे ( उक्त छः प्रकारकी सिद्धियाँ ) समाधिकी सिद्धिमें ( पुरुषका ज्ञान प्राप्त करनेमें ) विघ्न हैं और व्युत्थानमें सिद्धियाँ हैं।'
**व्याख्या—**उक्त छः प्रकारकी सिद्धियाँ साधकके सामने आवें तो इनका त्याग कर देना चाहिये, क्योंकि ये उसके साधनमें विघ्नस्वरूप हैं। हाँ, जिसका चित्त चञ्चल है, जो साधक नहीं है, जो समाधिकी या आत्मोद्धारकी आवश्यकता नहीं समझता है, ऐसे मनुष्यको किसी कारणसे प्राप्त हो जायँ तो उसके लिये अवश्य ही ये सिद्धियाँ हैं ॥३७॥
**सम्बन्ध—**यहाँतक नाना प्रकारके संयमोंसे जो भिन्न-भिन्न ज्ञान होते हैं, उनका वर्णन पुरुषके ज्ञानपर्यन्त किया गया; अब भिन्न-भिन्न संयमोंसे जो भिन्न-भिन्न प्रकारकी क्रियाशक्तियाँ उपलब्ध होती हैं, उनका वर्णन अगले सूत्रोंमें किया जाता है—
बन्धकारणशैथिल्यात्प्रचारसंवेदनाच्च चित्तस्य परशरीरावेशः ॥३८॥
'बन्धनके कारण ( कर्म ) की शिथिलतासे और चित्तकी गतिका भलीभाँति ज्ञान होनेसे चित्तका दूसरेके शरीरमें प्रवेश ( किया जा सकता है )।'
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**व्याख्या—**चित्तके बन्धनका कारण कर्म-संस्कार है; कर्मोंका फल भुगतानेके लिये ही यह चित्त किसी एक शरीरमें बँधे रहनेके लिये बाध्य हो जाता है। उक्त बन्धनके कारणरूप कर्म-संस्कारोंको जब मनुष्य समाधिके अभ्यासद्वारा शिथिल करके चित्तको स्वच्छ बना लेता है और साथ ही जिन-जिन मार्गोंद्वारा चित्त शरीरमें विचरता है (जाता-आता है), उन मार्गोंको और चित्तकी गतिको भी भलीभाँति जान लेता है, तब उसमें यह सामर्थ्य आ जाती है कि वह अपने चित्तको शरीरसे बाहर करके दूसरेके (मृत या जीवित) किसी भी शरीरमें प्रविष्ट कर सकता है। चित्तके साथ-साथ इन्द्रियाँ भी जहाँ चित्त जाता है, वहाँ अपने-आप चली जाती हैं ॥३८॥
उदानजयाज्जलपङ्ककण्टकादिष्वसङ्ग उत्क्रान्तिश्च ॥३९॥
'उदान वायुको जीत लेनेसे जल, कीचड़, कण्टकादिसे उसके शरीरका संयोग नहीं होता और ऊर्ध्वगति भी होती है।'
**व्याख्या—**शरीरके जीवनका आधार प्राण है, क्रियाभेदसे उसके प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान—ये पाँच नाम हैं। उनके लक्षण इस प्रकार हैं—
( १ ) प्राण—यह इन पाँचोंमें प्रधान है, इसकी गति मुख और नासिकाद्वारा होती है। नासिकाके अग्रभागसे लेकर हृदयतक शरीरमें इसका देश है।
( २ ) अपान—यह नीचेकी ओर गमन करनेवाला है,
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नाभिसे लेकर पादतलतक इसका देश है । मूत्र, विष्ठा और गर्भ आदि इसीके वेगसे नीचे उतरते हैं ।
(३) समान—हृदयसे लेकर नाभितक इसका देश है, खान-पानके रसको समस्त शरीरमें यथायोग्य पहुँचा देना इसका काम है, इसकी गति सम है ।
(४) व्यान—यह समस्त शरीरमें व्याप्त रहता हुआ ही विचरता है ।
(५) उदान—यह ऊपरकी ओर गमन करनेवाला है; कण्ठमें रहनेवाला और सिरतक गमन करनेवाला है । मृत्युके समय इसीके सहारे सूक्ष्म शरीरका गमन होता है ।
जब योगी उक्त उदान वायुपर विजय प्राप्त कर लेता है, तब उसका शरीर धुनी हुई रूईकी भाँति अत्यन्त हल्का हो जाता है, अतः पानी और कीचड़पर चलते हुए भी उसके पैर अंदर नहीं जाते, काँटे आदि भी उसके शरीरमें प्रविष्ट नहीं हो सकते । इसके सिवा, मरणकालमें उसके प्राण ब्रह्मरन्ध्र (मूर्धाके छिद्र) द्वारा निकलते हैं, इस कारण ऐसे योगीकी शुक्लमार्गसे गति होती है । उपनिषदोंमें भी उक्त ऊर्ध्वगतिका वर्णन आया है (देखिये कठ० २।३।१६) ॥३९॥
समानजयाज्ज्वलनम् ॥४०॥
'(संयमद्वारा) समान वायुको जीत लेनेसे (योगीका शरीर) दीप्तिमान् हो जाता है।'
व्याख्या—जब योगी संयमके द्वारा उपर्युक्त समानवायुको जीत लेता है, तब उसका शरीर अग्निके सदृश प्रज्वलित यानी अत्यन्त
विभूतिपाद-३ १११
देदीप्यमान (प्रकाशयुक्त) हो जाता है; क्योंकि जठराग्नि और समानवायुका घनिष्ठ सम्बन्ध है। अतः समानवायुको जीत लेनेपर योगी अपने शरीरमें रहनेवाले जठराग्निके आवरणको हटाकर अग्निके सदृश प्रकाशमान हो सकता है ॥४०॥
**सम्बन्ध—**पहले छत्तीसवें सूत्रमें जो छः सिद्धियाँ बतलायी गयी हैं, उनमेंसे श्रावण नामकी सिद्धिका साधन बतलाते हैं—
श्रोत्राकाशयोः सम्बन्धसंयमाद् दिव्यं श्रोत्रम् ॥४१॥
'श्रोत्र (कान) और आकाशके सम्बन्धमें संयम कर लेनेसे योगीके श्रोत्र दिव्य हो जाते हैं।'
**व्याख्या—**शब्दको ग्रहण करनेवाली श्रोत्र-इन्द्रिय अहंकारसे उत्पन्न हुई है और आकाशकी उत्पत्ति अहंकारजनित शब्दतन्मात्रा-से हुई है, अतः आकाश, शब्द और श्रोत्र-इन्द्रिय—इन तीनोंकी एकता है। इस श्रोत्र और आकाशके सम्बन्धको जब योगी संयम-द्वारा प्रत्यक्ष कर लेता है, तब उसकी श्रोत्र-इन्द्रियमें दिव्य शक्ति आ जाती है। फिर वह सूक्ष्म-से-सूक्ष्म शब्दको सुन सकता है तथा किसी वस्तुसे ढके हुए शब्दको भी सुन सकता है और जो शब्द कहीं दूर देशमें बोला जाय, उसे भी सुन सकता है; क्योंकि आकाश विभु अर्थात् सर्वव्यापी है, इस कारण उसके अंदर कहीं भी होनेवाला शब्द तत्काल ही सर्वत्र व्याप्त हो जाता है। अतः जिसकी श्रोत्र-इन्द्रिय दिव्य यानी अलौकिक हो जाती है, वह चाहे जिस शब्दको, जहाँपर वह हो, वहीं सुन सकता है ॥४१॥
११२ पातञ्जलयोगदर्शन
कायाकाशयोः सम्बन्धसंयमाल्लघुतूलसमापत्ते-
श्चाकाशगमनम् ॥४२॥
'शरीर और आकाशके सम्बन्धमें संयम करनेसे अथवा हल्की वस्तु (रूई आदि) में संयम करनेसे आकाशमें चलनेकी शक्ति आ जाती है।'
व्याख्या—शरीर और आकाशका जो सम्बन्ध है, उसे संयमद्वारा पूर्णतया प्रत्यक्ष कर लेनेपर योगी इस तत्त्वको भलीभाँति समझ लेता है कि शरीरके अङ्ग किस प्रकार सूक्ष्म अवस्थासे स्थूल अवस्थामें परिणत होते हैं और किस प्रकार पुनः स्थूलसे सूक्ष्म किये जाते हैं। अतः वह अपने शरीरको अत्यन्त हल्का बनाकर चाहे जहाँ गमन कर सकता है। इसी तरह योगी जब किसी भी सूक्ष्म (धुनी हुई रूई या बादल आदि) वस्तुमें संयम करके तद्रूप हो जाता है, तब उससे भी उसको आकाशगमनकी योग्यता मिल जाती है ॥४२॥
सम्बन्ध—अब ज्ञानके आवरणका नाश जिस उपायसे किया जा सकता है, वह बतलाते हैं—
बहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशा-
वरणक्षयः ॥४३॥
'शरीरके बाहर अकल्पित स्थितिका नाम महाविदेहा है। उससे बुद्धिकी ज्ञानशक्तिके आवरणका क्षय हो जाता है।'
व्याख्या—शरीरके बाहर जो मनकी स्थिति है, उसको विदेह-धारणा कहते हैं, वह जब मनके शरीरमें रहते हुए ही केवल
विभूतिपाद-३ ११३
भावनामात्रसे होती है, तब तो कल्पित है और जब शरीरसे सम्बन्ध छोड़कर बाहर निकले हुए मनकी बाहर स्थिर स्थिति हो जाती है, तब अकल्पित होती है । कल्पित धारणाके अभ्याससे ही अकल्पित धारणा सिद्ध होती है । इसीको महाविदेहा कहते हैं, इससे योगीके ज्ञानका आवरण नष्ट हो जाता है। यह धारणा इन्द्रिय और मनकी स्वरूपावस्थामें संयम करनेसे होती है (योग० ३।४८) ॥४३॥
**सम्बन्ध—**यहाँतक नाना प्रकारके संयमोंका फलसहित वर्णन किया; अब जो पहले पादके इकतालीसवें सूत्रमें ग्राह्य, ग्रहण और ग्रहीतामें की जानेवाली सबीज समाधिके लक्षण बतलाये गये थे, उसका फल बतलानेके लिये पहले पाँच भूतोंमें और तज्जनित पदार्थोंमें की जानेवाली ग्राह्यविषयक समाधिका फल बतलाते हैं—
स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमाद्
भूतजयः ॥४४॥
‘(भूतोंकी) स्थूल, स्वरूप, सूक्ष्म, अन्वय और अर्थवत्त्व— इन पाँच प्रकारकी अवस्थाओंमें संयम करनेसे (योगी) पाँचों भूतोंपर विजय प्राप्त कर लेता है।’
**व्याख्या—**पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—ये पाँच भूत हैं । इनमेंसे हरेककी पाँच अवस्थाएँ होती हैं । जैसे—
**(१) स्थूलावस्था—**जिस रूपमें हम इनको अपनी इन्द्रियों- द्वारा अनुभव कर रहे हैं, जिनको गीतामें इन्द्रियगोचर नाम दिया है (१३।५), वे इन्द्रियोंद्वारा प्रत्यक्ष अनुभवमें आनेवाले शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध नामवाले पाँचों विषय इनकी स्थूल-अवस्था है ।
पा० यो० द० ८—
११४ पातञ्जलयोगदर्शन
( २ ) स्वरूपावस्था—इनके जो लक्षण हैं, वह इनकी स्वरूपावस्था है। जैसे, पृथ्वीकी मूर्त्ति, जलका गीलापन, अग्निकी उष्णता और प्रकाश, वायुकी गति और कम्पन, आकाशका अवकाश—यह इनकी स्वरूपावस्था है; क्योंकि इन्हींसे इनकी भिन्न-भिन्न सत्ताका अनुभव होता है।
( ३ ) सूक्ष्मावस्था—इनकी जो कारण-अवस्था है, जिनको तन्मात्रा और सूक्ष्म महाभूत भी कहते हैं, वे इनकी सूक्ष्म-अवस्था हैं। जैसे पृथ्वीकी गन्धतन्मात्रा, जलकी रसतन्मात्रा, अग्निकी रूपतन्मात्रा, वायुकी स्पर्शतन्मात्रा और आकाशकी शब्दतन्मात्रा।
( ४ ) अन्वय-अवस्था—पाँचों भूतोंमें जो तीनों गुणोंका स्वभाव यानी प्रकाश, क्रिया और स्थिति व्याप्त है, वह इनकी अन्वय-अवस्था है।
( ५ ) अर्थवत्त्व-अवस्था—ये पाँचों भूत पुरुषके भोग और अपवर्गके लिये हैं। यही इनकी अर्थवत्त्व ( प्रयोजनता ) अवस्था है।
इन पाँचों भूतोंकी प्रत्येक अवस्थाके क्रमसे सम्पूर्ण अवस्थाओंमें भलीभाँति संयम करके जब योगी इनको प्रत्यक्ष कर लेता है, तब योगीका इन भूतोंपर पूरा अधिकार हो जाता है ॥४४॥
सम्बन्ध—इस प्रकार जब योगी भूतोंपर विजय प्राप्त कर लेता है, तब क्या होता है, सो बतलाते हैं—
ततोऽणिमादिप्रादुर्भावः कायसंपत्तद्धर्मानभिघातश्च ४५
'उससे (भूतजयसे) अणिमादि आठ सिद्धियोंका प्रकट हो जाना, कायसम्पत्की प्राप्ति और उन भूतोंके धर्मोंसे बाधा न होना—(ये तीनों होते हैं)।'
विभूतिपाद-३ ११५
व्याख्या— ( क ) ऊपर बतलायी हुई अणिमादि आठ सिद्धियोंके नाम और लक्षण इस प्रकार हैं—
( १ ) अणिमा—अणुके समान सूक्ष्मरूप धारण कर लेना। जैसे हनुमान्जीने सुरसाके मुखमें एवं लङ्कामें प्रवेश करते समय किया था ( वा० रामायण सुन्दर० १ । १५६; २ । ४७ )।
( २ ) लघिमा—शरीरको हल्का कर लेना। इससे जल, पङ्क और कण्टकादिसे बाधा नहीं होती ( योग० ३ । ३९ ) और आकाशमें गमन करनेकी शक्ति आ जाती है ( योग० ३ । ४२ )।
( ३ ) महिमा—शरीरको बड़ा कर लेना। जैसे हनुमान्जीने सुरसाके सामने किया था ( वा० रामायण सुन्दर० १ । १५४ )।
( ४ ) गरिमा—शरीरको भारी कर लेना। जैसे हनुमान्जीने भीमसेनके मार्गमें रुकावट डालते समय किया था ( महा० वन० १४६-१४७ वाँ अध्याय )।
( ५ ) प्राप्ति—जिस भौतिक पदार्थको चाहे, संकल्पमात्रसे ही प्राप्त कर लेना।
( ६ ) प्राकाम्य—बिना रुकावट भौतिक पदार्थसम्बन्धी इच्छाकी पूर्ति हो जाना।
( ७ ) वशित्व—पाँचों भूतोंका और तज्जन्य पदार्थोंका वशमें हो जाना।
( ८ ) ईशित्व—उन भूत और भौतिक पदार्थोंको नाना रूपोंमें उत्पन्न करनेकी और उनपर शासन करनेकी सामर्थ्य।
( ख ) कायसंपत्का विवरण अगले सूत्रमें आवेगा।
११६ पातञ्जलयोगदर्शन
( ग ) भूतोंके धर्मोंसे बाधा न होना—इसका यह भाव है कि भूतोंके धर्म उस योगीके काममें बाधा नहीं डाल सकते। वह पृथ्वीके अंदर भी उसी प्रकार प्रवेश कर सकता है, जैसे हरेक मनुष्य जलमें प्रवेश कर सकता है। पृथ्वीका धर्म स्थूलभाव ( कड़ापन ) उसे बाधा नहीं पहुँचा सकता। उसपर यदि पत्थरोंकी वर्षा की जाय तो वे उसके शरीरमें आघात नहीं पहुँचा सकते। इसी तरह जलका गीलापन उसके शरीरको गला नहीं सकता, अग्नि जला नहीं सकता अर्थात् सर्दी-गर्मी-वर्षा आदि कोई भी भूतोंके धर्म उसके शरीरमें किसी प्रकारकी बाधा नहीं पहुँचा सकते।
ये सब सिद्धियाँ योगीको चौवालीसवें सूत्रके कथनानुसार भूतोंकी सब अवस्थाओंपर विजय प्राप्त कर लेनेपर मिलती हैं, यह भाव है ॥ ४५ ॥
सम्बन्ध—उक्त कायसंपत्की व्याख्या सूत्रकार स्वयं करते हैं—
रूपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि कायसंपत् ॥ ४६ ॥
‘रूप, लावण्य, बल और वज्रके समान संगठन—ये कायसंपत् ( शरीरकी सम्पदाएँ ) हैं।’
व्याख्या—अत्यन्त सुन्दर आकृति, समस्त अङ्गोंमें चमक, बलकी बहुलता तथा शरीरके समस्त अङ्गोंका वज्रकी भाँति दृढ़ और परिपूर्ण हो जाना—ये चारों शरीरसम्बन्धी सम्पदा हैं ॥ ४६ ॥
सम्बन्ध—अब मनसहित इन्द्रियोंमें की जानेवाली ग्रहण-विषयक समाधिके फलका वर्णन करते हैं—
विभूतिपाद-३ ११७
ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्त्वसंयमादिन्द्रियजयः ४७
‘ग्रहण, स्वरूप, अस्मिता, अन्वय और अर्थवत्त्व—इन पाँचों अवस्थाओंमें संयम करनेसे मनसहित समस्त इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त हो जाती है।’
व्याख्या—मनसहित इन्द्रियोंकी पाँच अवस्थाएँ हैं। उनमें क्रमसे संयम करनेसे योगीका इन्द्रियोंपर पूर्ण अधिकार हो जाता है। उनकी अवस्थाओंके पाँच भेद इस प्रकार हैं—
( १ ) ग्रहण—विषयोंको ग्रहण करते समय जो वृत्तिके आकारमें मनसहित इन्द्रियोंकी अवस्था है, यह उनकी ग्रहण-अवस्था है।
( २ ) स्वरूप—मन और इन्द्रियोंका स्वाभाविक स्वरूप, जो कि अपने-अपने स्थानमें विद्यमान रहता है और लक्षण ( संकेत ) से जाननेमें आता है, यह उनकी स्वरूप-अवस्था है।
( ३ ) अस्मिता—यह मनसहित इन्द्रियोंका सूक्ष्मरूप है। इसीसे मनसहित दसों इन्द्रियोंकी उत्पत्ति होती है, यह उनकी सूक्ष्मावस्था है।
( ४ ) अन्वय—मनसहित सब इन्द्रियोंमें जो तीनों गुणोंका स्वभाव यानी प्रकाश, क्रिया और स्थिति व्याप्त है, वह इनकी अन्वय-अवस्था है।
( ५ ) अर्थवत्त्व—ये मनसहित सब इन्द्रियाँ पुरुषके भोग और अपवर्गके लिये हैं, यही इनकी अर्थवत्त्व-अवस्था ( सार्थकता ) है।
इस प्रकार जब मन और दसों इन्द्रियोंकी पाँचों अवस्थाओंमें योगी क्रमसे संयम करके भलीभाँति उनको प्रत्यक्ष कर लेता है, तब इन सबपर उसका पूरा अधिकार हो जाता है।