पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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नयापनसे पुरानापन आता जाता है, वह प्रतिक्षण परिवर्तित होता रहता है और फिर वर्तमान लक्षणको छोड़कर अतीत लक्षणमें चला जाता है, यह लक्षणका 'अवस्था-परिणाम' है । एकादश सूत्रके वर्णनानुसार जब चित्तरूप धर्मीका वर्तमान लक्षणवाला सर्वार्थतारूप धर्म दबकर अतीत लक्षणको प्राप्त होता है, उस वर्तमान कालमें जो उसके दबनेका क्रम है, वह उसका अवस्था-परिणाम है और जो एकाग्रतारूप धर्म अनागत लक्षणसे वर्तमान लक्षणमें आता है, तब उसका जो उदय होनेका क्रम है, वह भी अवस्था-परिणाम है । इस प्रकार यह एक अवस्थाको छोड़कर दूसरी अवस्थामें परिवर्तन होते जाना ही अवस्था-परिणाम है । यह अवस्था-परिणाम प्रतिक्षण होता रहता है । कोई भी त्रिगुणमय वस्तु क्षणभर भी एक अवस्थामें नहीं रहती । यही बात दसवें और बारहवें सूत्रोंमें निरोधधर्मके और एकाग्रधर्मके वर्तमान लक्षण-परिणाममें एक ही प्रकारके संस्कार और वृत्तियोंका क्षय और उदय बतलाकर दिखलायी गयी है । हम बालकसे जवान और जवानसे बूढ़े किसी एक दिनमें या एक घड़ीमें नहीं हुए, हमारा यह अवस्था-परिणाम अर्थात् अवस्थाका परिवर्तन प्रतिक्षणमें होता हुआ ही यहाँतक पहुँचा है । इसीको अवस्था-परिणाम कहते हैं । यह परिणाम विचारद्वारा समझमें आता है, सहसा प्रतीत नहीं होता; आगे कहेंगे भी कि क्रमका ज्ञान परिणामके अवसानमें होता है ( योग० ४ । ३३ ) ।
धर्म-परिणाममें तो धर्मीके धर्मका परिवर्तन होता है, लक्षण-परिणाममें पहले धर्मका अतीत हो जाना और नये धर्मका वर्तमान हो जाना—इस प्रकार धर्मका लक्षण बदलता है और