भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

पृष्ठ 110, कुल 184 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 110

९२ पातञ्जलयोगदर्शन

नयापनसे पुरानापन आता जाता है, वह प्रतिक्षण परिवर्तित होता रहता है और फिर वर्तमान लक्षणको छोड़कर अतीत लक्षणमें चला जाता है, यह लक्षणका 'अवस्था-परिणाम' है । एकादश सूत्रके वर्णनानुसार जब चित्तरूप धर्मीका वर्तमान लक्षणवाला सर्वार्थतारूप धर्म दबकर अतीत लक्षणको प्राप्त होता है, उस वर्तमान कालमें जो उसके दबनेका क्रम है, वह उसका अवस्था-परिणाम है और जो एकाग्रतारूप धर्म अनागत लक्षणसे वर्तमान लक्षणमें आता है, तब उसका जो उदय होनेका क्रम है, वह भी अवस्था-परिणाम है । इस प्रकार यह एक अवस्थाको छोड़कर दूसरी अवस्थामें परिवर्तन होते जाना ही अवस्था-परिणाम है । यह अवस्था-परिणाम प्रतिक्षण होता रहता है । कोई भी त्रिगुणमय वस्तु क्षणभर भी एक अवस्थामें नहीं रहती । यही बात दसवें और बारहवें सूत्रोंमें निरोधधर्मके और एकाग्रधर्मके वर्तमान लक्षण-परिणाममें एक ही प्रकारके संस्कार और वृत्तियोंका क्षय और उदय बतलाकर दिखलायी गयी है । हम बालकसे जवान और जवानसे बूढ़े किसी एक दिनमें या एक घड़ीमें नहीं हुए, हमारा यह अवस्था-परिणाम अर्थात् अवस्थाका परिवर्तन प्रतिक्षणमें होता हुआ ही यहाँतक पहुँचा है । इसीको अवस्था-परिणाम कहते हैं । यह परिणाम विचारद्वारा समझमें आता है, सहसा प्रतीत नहीं होता; आगे कहेंगे भी कि क्रमका ज्ञान परिणामके अवसानमें होता है ( योग० ४ । ३३ ) ।

धर्म-परिणाममें तो धर्मीके धर्मका परिवर्तन होता है, लक्षण-परिणाममें पहले धर्मका अतीत हो जाना और नये धर्मका वर्तमान हो जाना—इस प्रकार धर्मका लक्षण बदलता है और