पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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होकर दूसरे धर्मका उदय होता है, उसे 'धर्म-परिणाम' कहते हैं; जैसे नवें सूत्रमें चित्तरूप धर्मीके व्युत्थानसंस्काररूप धर्मका दब जाना और निरोधसंस्काररूप धर्मका प्रकट होना बतलाया गया है । यही धर्मोंमें विद्यमान रहनेवाले चित्तरूप धर्मीका धर्म-परिणाम है । इसी प्रकार ग्यारहवें सूत्रमें जो सर्वार्थतारूप धर्मका क्षय और एकाग्रतारूप धर्मका उदय बतलाया गया है, यह भी चित्तरूप धर्मीका धर्म-परिणाम है । इसी तरह मिट्टीमें पिण्डरूप धर्मका क्षय और घटरूप धर्मका उदय होना, फिर घटरूप धर्मका क्षय और ठीकरी (फूटे हुए घटके टुकड़े) रूप धर्मका उदय होना—सब प्रकारके धर्मोंमें विद्यमान रहनेवाले मिट्टीरूप धर्मीका धर्म-परिणाम है । इसी तरह अन्य समस्त वस्तुओंमें भी समझ लेना चाहिये ।
(२) लक्षण-परिणाम—यह परिणाम भी धर्म-परिणामके साथ-साथ हो जाता है । यह लक्षण-परिणाम धर्ममें होता है । वर्तमान धर्मका नष्ट हो जाना उसका अतीत लक्षण-परिणाम है, अनागत धर्मका प्रकट होना उसका वर्तमान लक्षण-परिणाम है और प्रकट होनेसे पहले वह अनागत लक्षणवाला रहता है । इन तीनोंको धर्मका 'लक्षण-परिणाम' कहते हैं । ग्यारहवें सूत्रमें जो चित्तके सर्वार्थता-धर्मका क्षय होना बतलाया गया है, वह उसका अतीत लक्षण-परिणाम है और जो एकाग्रतारूप धर्मका उदय होना बतलाया है, वह उसका वर्तमान लक्षण-परिणाम है । उदय होनेसे पहले वह अनागत लक्षण-परिणाममें था । इसी प्रकार दूसरी वस्तुओंके परिणामोंके विषयमें भी समझ लेना चाहिये ।
(३) अवस्था-परिणाम—जो वर्तमान लक्षणयुक्त धर्ममें