पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १२ )
यदाऽऽत्मतत्त्वेन तु ब्रह्मतत्त्वं दीपोपमेनेह युक्तः प्रपश्येत् ।
अजं ध्रुवं सर्वतत्त्वैर्विशुद्धं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥
(२।१५)
‘जब योगी यहाँ दीपकके सदृश (प्रकाशमय) आत्मतत्त्वके द्वारा ब्रह्मतत्त्वको भलीभाँति प्रत्यक्ष देख लेता है, उस समय वह उस अजन्मा, निश्चल, समस्त तत्त्वोंसे विशुद्ध परमदेव परमात्माको जानकर सब बन्धनोंसे सदाके लिये छूट जाता है।’
कोई भी सच्चा सम्बन्ध सजातीय तत्त्वसे ही हो सकता है, विजातीयसे नहीं। ईश्वरका सजातीय तत्त्व आत्मा ही है; अतः उसीसे उसका प्रत्यक्ष अनुभव हो सकता है, अन्य जड तत्त्वोंसे नहीं।
इस शास्त्रमें प्रकृतिके चौबीस भेद एवं आत्मा और ईश्वर—इस प्रकार कुल छब्बीस तत्त्व माने गये हैं; उनमें प्रकृति तो जड और परिणामशील है अर्थात् निरन्तर परिवर्तन होना उसका धर्म है तथा मुक्त पुरुष और ईश्वर—ये दोनों नित्य, चेतन, स्वप्रकाश, असङ्ग, देशकालातीत, सर्वथा निर्विकार और अपरिणामी हैं। प्रकृतिमें बँधा हुआ पुरुष अल्पज्ञ, सुख-दुःखोंका भोक्ता, अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म लेनेवाला और देशकालातीत होते हुए भी एकदेशी-सा माना गया है।
इसके सिवा, योगशास्त्रमें वर्णित साधनोंका प्रायः उपनिषद्, गीता, भागवत आदि सभी धर्मग्रन्थ समर्थन करते हैं। अतः प्रत्येक साधकको इस ग्रन्थमें बताये हुए साधनोंका श्रद्धापूर्वक सेवन करना चाहिये।
विनीत—हरिकृष्णदास गोयन्दका