भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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जैसे विवेकज्ञानका स्वरूप, उसके अवस्थाभेद और फल आदि-का आशय समझना हो तो प्रथम पादके ४८ और ४९, द्वितीय पादके २६से २८, तृतीय पादके ३५, ३६, ४९, ५२, ५३, और ५४ तथा चतुर्थ पादके २५, २६ और २९—इन सब सूत्रोंको सम्मुख रखकर उनपर विचार करना चाहिये। यदि अविद्याके स्वरूपका निर्णय करना हो तो प्रथम पादके ८, द्वितीय पादके ३, ४, ५, १२, २४ और २५ तथा चतुर्थ पादके ११, २८ और ३०—इन सब सूत्रोंको सामने रखकर विचार करें। एवं यदि समाधिके स्वरूपको उसके अवान्तर भेदोंसहित भलीभाँति समझना हो तो प्रथम पादके १७ से २२ और ४१से ५१, तृतीय पादके ३, ९ से १२, ३५, ३७, ४४, ४७, ४९ और ५० तथा चतुर्थ पादके १, २९, ३०, ३२ और ३४—इन सब सूत्रोंपर दृष्टिपात करके गम्भीरतापूर्वक भलीभाँति विचार करना चाहिये। इसी प्रकार अन्यान्य प्रसङ्गोंका विवेचन करते समय भी तद्विषयक समस्त सूत्रोंपर ध्यान देना चाहिये। ऐसा करनेसे ग्रन्थका आशय समझनेमें बड़ी सुगमता होती है, यह मेरा अनुमान है।

इस ग्रन्थमें पुरुषविशेष ईश्वरका प्रतिपादन करके उसकी शरणागतिको आत्म-साक्षात्कारका कारण बताया है, परन्तु उस ईश्वरको जाननेका कोई भिन्न साधन नहीं बताया गया। इससे यह अनुमान किया जा सकता है कि वहाँतक न तो मन-बुद्धि आदि प्राकृत तत्त्वोंकी पहुँच है और न उस प्रकृतिस्थ पुरुषकी ही। वह एकमात्र प्रकृतिसे अलग विशुद्ध आत्मतत्त्वसे ही प्रत्यक्ष किया जा सकता है; जैसा कि श्वेताश्वतरोपनिषद्में कहा है—