भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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साथ ही योगदर्शनके सिद्धान्तमें जो-जो शङ्काएँ हो सकती हैं, उनका समाधान किया गया है। अन्तमें धर्ममेघ समाधिका वर्णन करके (योग० ४।२९) उसका फल क्लेश और कर्मोंका सर्वथा अभाव (योग० ४।३०) तथा गुणोंके परिणाम-क्रमकी समाप्ति अर्थात् पुनर्जन्मका अभाव बताया गया है (योग० ४।३२) एवं पुरुषको मुक्ति प्रदान करके अपना कर्तव्य पूरा कर चुकनेके कारण गुणोंके कार्यका अपने कारणमें विलीन हो जाना अर्थात् पुरुषसे सर्वथा अलग हो जाना गुणोंकी कैवल्य-स्थिति और उन गुणोंसे सर्वथा अलग होकर अपने रूपमें प्रतिष्ठित हो जाना पुरुषकी कैवल्य-स्थिति बतलाकर (योग० ४।३४) ग्रन्थकी समाप्ति की गयी है।

विशेष वक्तव्य

इस प्रकार इस ग्रन्थमें बहुत ही थोड़े शब्दोंमें आत्मकल्याण-के बहुत ही उपयोगी और प्रत्यक्ष उपाय बताये गये हैं।

पाठकोंको चाहिये कि ग्रन्थका रहस्य समझनेके लिये उसे आद्योपान्त पढ़कर उसपर विचार करें। जिस किसी विषयका वर्णन प्रकारान्तरसे कई जगह हुआ हो, उसके सभी स्थलोंपर दृष्टि डालकर पूर्वापरके विरोधाभासको मिटाकर उसकी संगति बैठावें। जबतक अपने मनमें पूरा संतोष न हो जाय तबतक उसकी खोज करते रहें। दूसरे टीकाकारोंने उसकी संगति किस प्रकार लगायी है, वर्तमान अनुभवी सज्जनोंका उस विषयपर क्या कहना है और मूल-ग्रन्थसे सरलतापूर्वक बिना किसी प्रकारकी खींचतानके क्या भाव झलकता है—इन सब बातोंपर गम्भीरतापूर्वक विचार करनेपर कुछ समाधान हो सकता है।