भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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कारणभूत क्लेश जबतक रहते हैं, तबतक जीवको उनका फल भोगनेके लिये नाना प्रकारकी योनियोंमें बार-बार जन्मना और मरना पड़ता है एवं पापकर्मका फल भोगनेके लिये घोर नरकोंकी यातना भी सहन करनी पड़ती है । पुण्यकर्मोंका फल जो अच्छी योनियोंकी और सुखभोगसम्बन्धी सामग्रीकी प्राप्ति है, वह भी विवेककी दृष्टिसे दुःख ही है ( योग० २ । १५ ); अतः समस्त दुःखोंका सर्वथा अत्यन्त अभाव करनेके लिये क्लेशोंका मूलोच्छेद करना परम आवश्यक है । इस पादमें उनके नाशका उपाय निश्चल और निर्मल विवेकज्ञानको ( योग० २ । २६ ) तथा उस विवेक-ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय योगसम्बन्धी आठ अङ्गोंके अनुष्ठानको ( योग० २ । २८ ) बताया है । इसलिये साधकको चाहिये कि बताये हुए योगसाधनोंका श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान करे ।

विभूतिपाद

इस तीसरे विभूतिपादमें धारणा, ध्यान और समाधि—इन तीनोंका एकत्रित नाम 'संयम' बतलाकर भिन्न-भिन्न ध्येय पदार्थोंमें संयमका भिन्न-भिन्न फल बतलाया है, उनको योगका महत्त्व, सिद्धि और विभूति भी कहते हैं। इनका वर्णन यहाँ ग्रन्थकारने समस्त ऐश्वर्यमें वैराग्य उत्पन्न करनेके लिये ही किया है । यही कारण है कि इस पादके सैंतीसवें, पचासवें और इक्यावनवेंमें एवं चौथे पादके उन्तीसवें सूत्रमें उनको समाधिमें विघ्नरूप बताया है । अतः साधकको भूलकर भी सिद्धियोंके प्रलोभनमें नहीं पड़ना चाहिये ।

कैवल्यपाद

इस चौथे पादमें कैवल्यपद प्राप्त करनेयोग्य चित्तके स्वरूप-का प्रतिपादन किया गया है ( योग० ४ । २२-२३, २६ ) ।