पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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उपर्युक्त तीन भेदोंमेंसे संप्रज्ञातयोगके दो भेद हैं। उनमें जो सविकल्प योग है, वह तो पूर्वावस्था है, उसमें विवेकज्ञान नहीं होता। दूसरा जो निर्विकल्प योग है, जिसे निर्विचार समाधि भी कहते हैं, वह जब निर्मल हो जाता है (योग० १ । ४७), उस समय उसमें विवेकज्ञान प्रकट होता है; वह विवेकज्ञान पुरुषख्यातितक हो जाता है (योग० ३ । ३५), जो कि पर-वैराग्यका हेतु है (योग० १ । १६)। तथा प्रकृति और पुरुषके वास्तविक स्वरूपका ज्ञान होनेके साथ ही साधककी समस्त गुणोंमें और उनके कार्यमें आसक्तिका सर्वथा अभाव हो जाता है। उससे चित्तमें कोई भी वृत्ति नहीं रहती, यह सर्ववृत्तिनिरोधरूप निर्बीज समाधि है (योग० १ । ५१)। इसीको असंप्रज्ञातयोग तथा धर्ममेघ समाधि (योग० ४ । २९) भी कहते हैं, इसकी विस्तृत व्याख्या यथास्थान की गयी है। निर्बीज समाधि ही योगका अन्तिम लक्ष्य है, इसीसे आत्माकी स्वरूपप्रतिष्ठा या यों कहिये कि कैवल्यस्थिति होती है (योग० ४ । ३४)।
निरोध-अवस्थामें चित्तका या उसके कारणरूप तीनों गुणोंका सर्वथा नाश नहीं होता; किन्तु जड-प्रकृति-तत्त्वसे जो चेतन-तत्त्वका अविद्याजनित संयोग है, उसका सर्वथा अभाव हो जाता है।
साधनपाद
इस दूसरे पादमें समस्त दुःखोंके कारण अविद्यादि पाँच क्लेशोंको बताया गया है; क्योंकि इनके रहते हुए मनुष्य जो कुछ कर्म करता है, वे संस्काररूपसे अन्तःकरणमें इकट्ठे होते रहते हैं, उन संस्कारोंके समुदायका नाम ही कर्माशय है। इस कर्माशयके