पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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ग्रहण और ग्रहीताविषयक समाधिका विवेचन भी स्पष्ट शब्दोंमें नहीं किया; अतः विषय बहुत ही जटिल हो गया है। यही कारण है कि बड़े-बड़े टीकाकारोंका संप्रज्ञातसमाधिके स्वरूपसम्बन्धी विवेचन करनेमें मतभेद हो गया है, किसीके भी निर्णयसे पूरा सन्तोष नहीं होता। मैंने यथासाध्य पूर्वापरके सम्बन्धकी सङ्गति बैठाकर विषयको सरल बनानेकी चेष्टा तो की है, तथापि पूरी बात तो किसी अनुभवी महापुरुषके कथनानुसार श्रद्धापूर्वक अभ्यास करनेसे वैसी स्थिति प्राप्त होनेपर ही समझमें आ सकती है और तभी पूरा सन्तोष हो सकता है, यह मेरी धारणा है।
प्रधानतया योगके तीन भेद माने गये हैं—एक सविकल्प, दूसरा निर्विकल्प और तीसरा निर्बीज। इस पादमें निर्बीज समाधिका उपाय प्रधानतया पर-वैराग्यको बताकर (योग० १।१८) उसके बाद दूसरा सरल उपाय ईश्वरकी शरणागतिको बतलाया है (योग० १।२३), श्रद्धालु आस्तिक साधकोंके लिये यह बड़ा ही उपयोगी है। ईश्वरका महत्त्व स्वीकार कर लेनेके कारण इनके सिद्धान्तमें साधारण बद्ध और मुक्त पुरुषोंकी ईश्वरसे भिन्नता तथा अनेकता सिद्ध होती है। योगदर्शनकी तात्त्विक मान्यता प्रायः सांख्यशास्त्रसे मिलती-जुलती है। कई लोग यद्यपि सांख्यशास्त्रको अनीश्वरवादी बतलाते हैं, परन्तु सांख्यशास्त्रपर भलीभाँति विचार करनेपर यह कहना ठीक मालूम नहीं होता; क्योंकि सांख्यदर्शनके तीसरे पादके ५६ वें और ५७ वें सूत्रोंमें स्पष्ट ही ईश्वरकी साधारण पुरुषोंकी अपेक्षा विशेषता स्वीकार की गयी है। अतः सांख्य और योगके तात्त्विक विवेचनमें वर्णनशैलीके अतिरिक्त और कोई मतभेद प्रतीत नहीं होता।