पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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रूप अवस्थाविशेष नहीं है। तथा विपर्ययवृत्तिका लक्षण करते समय उसे मिथ्याज्ञान बताया है। अतः साधारण तौरपर यही समझमें आता है कि दूसरे पादमें 'अविद्या'के नामसे जिस प्रधान क्लेशका वर्णन किया गया है (योग० २।५), वह और चित्तकी विपर्यय-वृत्ति—दोनों एक ही है, परन्तु गम्भीरतापूर्वक विचार करनेपर यह बात ठीक नहीं मालूम होती। ऐसा माननेमें जो-जो आपत्तियाँ आती हैं, उनका दिग्दर्शन सूत्रोंकी टीकामें कराया गया है (देखिये योग० १।८; २।३, ५ की टीका)। द्रष्टा और दर्शनकी एकतारूप अस्मिता-क्लेशके कारणका नाम 'अविद्या' है (योग० २।२४), वह अस्मिता चित्तकी कारण मानी गयी है (योग० ३।४७; ४।४)। इस परिस्थितिमें अस्मिताके कार्यरूप चित्तकी वृत्ति अस्मिताकी भी कारणरूपा अविद्या कैसे हो सकती है—यह विचारणीय विषय है।
इस पादके सतरहवें और अठारहवें सूत्रोंमें समाधिके लक्षणोंका वर्णन बहुत ही संक्षेपमें किया गया है, उसके बाद इकतालीसवेंसे लेकर इस पादकी समाप्तितक इसी विषयका कुछ विस्तारसे पुनः वर्णन किया गया है; परंतु विषय इतना गम्भीर है कि समाधिकी वैसी स्थिति प्राप्त कर लेनेके पहले उसका ठीक-ठीक भाव समझ लेना बहुत ही कठिन है। मैंने अपनी साधारण बुद्धिके अनुसार उन सूत्रोंकी टीकामें विषयको समझानेकी चेष्टा की है, किन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि इतनेसे ही पाठकोंको सन्तोष हो जायगा; क्योंकि सूत्रकारने आनन्दानुगत और अस्मितानुगत समाधिका स्वरूप यहाँ स्पष्ट शब्दोंमें नहीं बताया, इसी प्रकार