भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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भाषाटीका' लिखनी आरम्भ की थी। टीका थोड़े ही दिनोंमें लिखी जा चुकी थी, परन्तु उसी समय 'कल्याण' के उपनिषदङ्कका निकालना निश्चय हो गया; अतः ईशावास्योपनिषद्से लेकर श्वेताश्वतरोपनिषद् तक नौ उपनिषदोंकी टीका लिखनेका भार मुझपर आ पड़ा। इस कारण योगदर्शनकी टीकाका संशोधनकार्य नहीं हो सका एवं प्रेसमें भी छापनेके लिये अवकाश नहीं रहा। इसके सिवा और भी व्यापार-सम्बन्धी काम हो गये, अतः प्रकाशनकार्यमें विलम्ब हुआ। इस समय सरकारका कागजोंपरसे कंट्रोल उठ जानेसे एवं प्रेसमें भी छपाईके लिये कुछ अवकाश मिल जानेसे यह टीका प्रकाशित की जा रही है।

यह तो पाठकगण जानते ही होंगे कि मैं न तो विद्वान् हूँ और न अनुभवी ही। अतः योगदर्शन-जैसे गम्भीर शास्त्रपर टीका लिखना मेरे-जैसे अल्पज्ञ मनुष्यके लिये सर्वथा अनधिकार चेष्टा है। तथापि मैंने इसपर अपने और मित्रोंके सन्तोषके लिये जैसा कुछ समझमें आया, वैसा लिखनेकी धृष्टता की है। इसके लिये अनुभवी विद्वान् सज्जनोंसे सानुनय प्रार्थना है कि इस टीकामें जहाँ जो त्रुटियाँ रह गयी हों, उनकी सूचना देनेकी कृपा करें, ताकि दूसरे संस्करणमें आवश्यक सुधार किया जा सके।

समाधिपाद

इस ग्रन्थके पहले पादमें योगके लक्षण, स्वरूप और उसकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन करते हुए चित्तकी वृत्तियोंके पाँच भेद और उनके लक्षण बतलाये गये हैं। वहाँ सूत्रकारने निद्राको भी चित्तकी वृत्तिविशेषके अन्तर्गत माना है (योग० १।१०), अन्य दर्शनकारोंकी भाँति इनकी मान्यतामें निद्रा वृत्तियोंका अभाव-