पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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पातञ्जलयोगदर्शन
जाननेमें आनेवाले जितने भी पदार्थ हैं, उनका अन्तःकरण और इन्द्रियोंके साथ बिना किसी व्यवधानके सम्बन्ध होनेसे जो भ्रान्ति तथा संशयरहित ज्ञान होता है, वह प्रत्यक्ष अनुभवसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति है। जिन प्रत्यक्ष दर्शनोंसे संसारके पदार्थोंकी क्षणभङ्गुरताका निश्चय होकर या सब प्रकारसे उनमें दुःखकी प्रतीति होकर (योग० २ । १५) मनुष्यका सांसारिक पदार्थोंमें वैराग्य हो जाता है, जो चित्तकी वृत्तियोंको रोकनेमें सहायक हैं, जिनसे मनुष्यकी योगसाधनमें श्रद्धा और उत्साह बढ़ते हैं, उनसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति तो अक्लिष्ट है। तथा जिन प्रत्यक्ष दर्शनोंसे मनुष्यको सांसारिक पदार्थ नित्य और सुखरूप प्रतीत होते हैं, भोगोंमें आसक्ति हो जाती है, जो वैराग्यके विरोधी भावोंको बढ़ानेवाले हैं, उनसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति क्लिष्ट है।
(२) अनुमान प्रमाण—किसी प्रत्यक्ष दर्शनके सहारे युक्तियोंद्वारा जो अप्रत्यक्ष पदार्थके स्वरूपका ज्ञान होता है, वह अनुमानसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति है। जैसे धूमको देखकर अग्निकी विद्यमानताका ज्ञान होना, नदीमें बाढ़ आया देखकर दूर देशमें वृष्टि होनेका ज्ञान होना—इत्यादि। इनमें भी जिन अनुमानोंसे मनुष्यको संसारके पदार्थोंकी अनित्यता, दुःखरूपता आदि दोषोंका ज्ञान होकर उनमें वैराग्य होता है और योगके साधनोंमें श्रद्धा बढ़ती है, जो आत्मज्ञानमें सहायक हैं, वे सब वृत्तियाँ तो अक्लिष्ट हैं और उनके विपरीत वृत्तियाँ क्लिष्ट हैं।
(३) आगम प्रमाण—वेद, शास्त्र और आप्त (यथार्थ वक्ता) पुरुषोंके वचनको 'आगम' कहते हैं। जो पदार्थ मनुष्यके अन्तःकरण