पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
पृष्ठ 19, कुल 184 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमाधिपाद-१ ३
लक्षणोंके अनुसार पाँच प्रकारकी होती हैं तथा हर प्रकारकी वृत्तिके दो भेद होते हैं। एक तो क्लिष्ट यानी अविद्यादि क्लेशोंको पुष्ट करनेवाली और योगसाधनमें विघ्नरूप होती है तथा दूसरी अक्लिष्ट यानी क्लेशोंका क्षय करनेवाली और योगसाधनमें सहायक होती है। इस रहस्यको भलीभाँति समझकर पहले अक्लिष्ट वृत्तियोंसे क्लिष्ट वृत्तियोंको हटाकर फिर उन अक्लिष्ट वृत्तियोंका भी निरोध करके योग सिद्ध करना चाहिये ॥५॥
सम्बन्ध—उक्त पाँच प्रकारकी वृत्तियोंके लक्षणोंका वर्णन करनेके लिये पहले उनके नाम बतलाते हैं—
प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः ॥६॥
'(१) प्रमाण, (२) विपर्यय, (३) विकल्प, (४) निद्रा, (५) स्मृति—(ये पाँच हैं)।'
व्याख्या—इन पाँचोंके स्वरूपका वर्णन स्वयं सूत्रकारने अगले सूत्रोंमें किया है, अतः यहाँ उनकी व्याख्या नहीं की गयी है ॥६॥
सम्बन्ध—उपर्युक्त पाँच प्रकारकी वृत्तियोंमेंसे प्रमाणवृत्तिके भेद बतलाये जाते हैं—
प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि ॥७॥
'प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम—(ये तीनों) प्रमाण हैं।'
व्याख्या—प्रमाणवृत्ति तीन प्रकारकी होती है, उसको इस प्रकार समझना चाहिये—
(१) प्रत्यक्ष प्रमाण—बुद्धि, मन और इन्द्रियोंके द्वारा