पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ पातञ्जलयोगदर्शन
सम्बन्ध— योगका सर्वोपरि फल बतलाते हैं—
तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥३॥
'उस समय द्रष्टाकी अपने रूपमें स्थिति हो जाती है।'
व्याख्या— जब चित्तकी वृत्तियोंका निरोध हो जाता है, उस समय द्रष्टा (आत्मा) की अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है; अर्थात् वह कैवल्य-अवस्थाको प्राप्त हो जाता है (योग० ४।३४) ॥३॥
सम्बन्ध— क्या चित्तवृत्तियोंका निरोध होनेके पहले द्रष्टा अपने स्वरूपमें स्थित नहीं रहता ?—इसपर कहते हैं—
वृत्तिसारूप्यमितरत्र ॥४॥
'दूसरे समयमें (द्रष्टा) वृत्तिके रूपवाला-सा (रहता) है।'
व्याख्या— जबतक योगसाधनोंके द्वारा चित्तकी वृत्तियोंका निरोध नहीं हो जाता, तबतक द्रष्टा अपने चित्तकी वृत्तिके ही अनुरूप अपना स्वरूप समझता रहता है, उसे अपने वास्तविक स्वरूपका ज्ञान नहीं होता। अतः चित्तवृत्तिनिरोधरूप योग अवश्य-कर्तव्य है ॥४॥
सम्बन्ध— चित्तकी वृत्तियाँ असंख्य होती हैं, अतः उनको पाँच श्रेणियोंमें बाँटकर सूत्रकार उनका स्वरूप बतलाते हैं—
वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः ॥५॥
'(उपर्युक्त) क्लिष्ट और अक्लिष्ट भेदोंवाली वृत्तियाँ पाँच प्रकारकी होती हैं।'
व्याख्या— ये चित्तकी वृत्तियाँ आगे वर्णन किये जानेवाले