पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
२ पातञ्जलयोगदर्शन
सम्बन्ध— योगका सर्वोपरि फल बतलाते हैं—
तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥३॥
'उस समय द्रष्टाकी अपने रूपमें स्थिति हो जाती है।'
व्याख्या— जब चित्तकी वृत्तियोंका निरोध हो जाता है, उस समय द्रष्टा (आत्मा) की अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है; अर्थात् वह कैवल्य-अवस्थाको प्राप्त हो जाता है (योग० ४।३४) ॥३॥
सम्बन्ध— क्या चित्तवृत्तियोंका निरोध होनेके पहले द्रष्टा अपने स्वरूपमें स्थित नहीं रहता ?—इसपर कहते हैं—
वृत्तिसारूप्यमितरत्र ॥४॥
'दूसरे समयमें (द्रष्टा) वृत्तिके रूपवाला-सा (रहता) है।'
व्याख्या— जबतक योगसाधनोंके द्वारा चित्तकी वृत्तियोंका निरोध नहीं हो जाता, तबतक द्रष्टा अपने चित्तकी वृत्तिके ही अनुरूप अपना स्वरूप समझता रहता है, उसे अपने वास्तविक स्वरूपका ज्ञान नहीं होता। अतः चित्तवृत्तिनिरोधरूप योग अवश्य-कर्तव्य है ॥४॥
सम्बन्ध— चित्तकी वृत्तियाँ असंख्य होती हैं, अतः उनको पाँच श्रेणियोंमें बाँटकर सूत्रकार उनका स्वरूप बतलाते हैं—
वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः ॥५॥
'(उपर्युक्त) क्लिष्ट और अक्लिष्ट भेदोंवाली वृत्तियाँ पाँच प्रकारकी होती हैं।'
व्याख्या— ये चित्तकी वृत्तियाँ आगे वर्णन किये जानेवाले
समाधिपाद-१ ३
लक्षणोंके अनुसार पाँच प्रकारकी होती हैं तथा हर प्रकारकी वृत्तिके दो भेद होते हैं। एक तो क्लिष्ट यानी अविद्यादि क्लेशोंको पुष्ट करनेवाली और योगसाधनमें विघ्नरूप होती है तथा दूसरी अक्लिष्ट यानी क्लेशोंका क्षय करनेवाली और योगसाधनमें सहायक होती है। इस रहस्यको भलीभाँति समझकर पहले अक्लिष्ट वृत्तियोंसे क्लिष्ट वृत्तियोंको हटाकर फिर उन अक्लिष्ट वृत्तियोंका भी निरोध करके योग सिद्ध करना चाहिये ॥५॥
सम्बन्ध—उक्त पाँच प्रकारकी वृत्तियोंके लक्षणोंका वर्णन करनेके लिये पहले उनके नाम बतलाते हैं—
प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः ॥६॥
'(१) प्रमाण, (२) विपर्यय, (३) विकल्प, (४) निद्रा, (५) स्मृति—(ये पाँच हैं)।'
व्याख्या—इन पाँचोंके स्वरूपका वर्णन स्वयं सूत्रकारने अगले सूत्रोंमें किया है, अतः यहाँ उनकी व्याख्या नहीं की गयी है ॥६॥
सम्बन्ध—उपर्युक्त पाँच प्रकारकी वृत्तियोंमेंसे प्रमाणवृत्तिके भेद बतलाये जाते हैं—
प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि ॥७॥
'प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम—(ये तीनों) प्रमाण हैं।'
व्याख्या—प्रमाणवृत्ति तीन प्रकारकी होती है, उसको इस प्रकार समझना चाहिये—
(१) प्रत्यक्ष प्रमाण—बुद्धि, मन और इन्द्रियोंके द्वारा
४
पातञ्जलयोगदर्शन
जाननेमें आनेवाले जितने भी पदार्थ हैं, उनका अन्तःकरण और इन्द्रियोंके साथ बिना किसी व्यवधानके सम्बन्ध होनेसे जो भ्रान्ति तथा संशयरहित ज्ञान होता है, वह प्रत्यक्ष अनुभवसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति है। जिन प्रत्यक्ष दर्शनोंसे संसारके पदार्थोंकी क्षणभङ्गुरताका निश्चय होकर या सब प्रकारसे उनमें दुःखकी प्रतीति होकर (योग० २ । १५) मनुष्यका सांसारिक पदार्थोंमें वैराग्य हो जाता है, जो चित्तकी वृत्तियोंको रोकनेमें सहायक हैं, जिनसे मनुष्यकी योगसाधनमें श्रद्धा और उत्साह बढ़ते हैं, उनसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति तो अक्लिष्ट है। तथा जिन प्रत्यक्ष दर्शनोंसे मनुष्यको सांसारिक पदार्थ नित्य और सुखरूप प्रतीत होते हैं, भोगोंमें आसक्ति हो जाती है, जो वैराग्यके विरोधी भावोंको बढ़ानेवाले हैं, उनसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति क्लिष्ट है।
(२) अनुमान प्रमाण—किसी प्रत्यक्ष दर्शनके सहारे युक्तियोंद्वारा जो अप्रत्यक्ष पदार्थके स्वरूपका ज्ञान होता है, वह अनुमानसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति है। जैसे धूमको देखकर अग्निकी विद्यमानताका ज्ञान होना, नदीमें बाढ़ आया देखकर दूर देशमें वृष्टि होनेका ज्ञान होना—इत्यादि। इनमें भी जिन अनुमानोंसे मनुष्यको संसारके पदार्थोंकी अनित्यता, दुःखरूपता आदि दोषोंका ज्ञान होकर उनमें वैराग्य होता है और योगके साधनोंमें श्रद्धा बढ़ती है, जो आत्मज्ञानमें सहायक हैं, वे सब वृत्तियाँ तो अक्लिष्ट हैं और उनके विपरीत वृत्तियाँ क्लिष्ट हैं।
(३) आगम प्रमाण—वेद, शास्त्र और आप्त (यथार्थ वक्ता) पुरुषोंके वचनको 'आगम' कहते हैं। जो पदार्थ मनुष्यके अन्तःकरण
समाधिपाद-१ [५]
और इन्द्रियोंके प्रत्यक्ष नहीं है एवं जहाँ अनुमानकी भी पहुँच नहीं है, उसके स्वरूपका ज्ञान वेद, शास्त्र और महापुरुषोंके वचनोंसे होता है, वह आगमसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति है। जिस आगम प्रमाणसे मनुष्यका भोगोंमें वैराग्य होता है, (गीता ५। २२) और योगसाधनोंमें श्रद्धा-उत्साह बढ़ते हैं, वह तो अक्लिष्ट है; और जिस आगम-प्रमाणसे भोगोंमें प्रवृत्ति और योगसाधनोंमें अरुचि हो, जैसे स्वर्गलोकके भोगोंकी बड़ाई सुनकर उनमें और उनके साधनरूप सकाम कर्मोंमें आसक्ति और प्रवृत्ति होती है, वह क्लिष्ट है ॥७॥
सम्बन्ध—प्रमाणवृत्तिके भेद बतलाकर अब विपर्ययवृत्तिके लक्षण बतलाते हैं—
विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ॥८॥
'जो उस वस्तुके स्वरूपमें प्रतिष्ठित नहीं है, ऐसा मिथ्या ज्ञान विपर्यय है।'
व्याख्या—किसी भी वस्तुके असली स्वरूपको न समझकर उसे दूसरी ही वस्तु समझ लेना—यह विपरीत ज्ञान ही विपर्यय-वृत्ति है—जैसे सीपमें चाँदीकी प्रतीति। यह वृत्ति भी यदि भोगोंमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाली और योगमार्गमें श्रद्धा-उत्साह बढ़ानेवाली हो तो अक्लिष्ट है, अन्यथा क्लिष्ट है।
जिन साधनोंसे यथार्थ ज्ञान होता है, उन्हींसे विपरीत ज्ञान भी होता है। यह मिथ्या ज्ञान भी कभी-कभी भोगोंमें वैराग्य करनेवाला हो जाता है। जैसे भोग्य पदार्थोंकी क्षणभङ्गुरताको देखकर, अनुमान करके या सुनकर उनको सर्वथा मिथ्या मान लेना योग-
६ पातञ्जलयोगदर्शन
सिद्धान्तके अनुसार विपरीत वृत्ति है, क्योंकि वे परिवर्तनशील होनेपर भी मिथ्या नहीं हैं, तथापि यह मान्यता भोगोंमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाली होनेसे अक्लिष्ट हैं।
कुछ महानुभावोंके मतानुसार विपर्ययवृत्ति और अविद्या—दोनों एक ही हैं, परंतु यह युक्तिसङ्गत नहीं मालूम होता; क्योंकि अविद्याका नाश तो केवल असंप्रज्ञात योगसे ही होता है (योग० ४। २९-३०), जहाँ प्रमाणवृत्ति भी नहीं रहती। किंतु विपर्ययवृत्तिका नाश तो प्रमाणवृत्तिसे ही हो जाता है। इसके सिवा योगशास्त्रके मतानुसार विपर्यय ज्ञान चित्तकी वृत्ति है, किंतु अविद्या चित्तकी वृत्ति नहीं मानी गयी है; क्योंकि वह द्रष्टा और दृश्यके स्वरूपकी उपलब्धिमें हेतुभूत संयोगकी भी कारण है (योग० २। २३-२४) तथा अस्मिता और राग आदि क्लेशोंकी भी कारण है (योग० २।४)। इसके अतिरिक्त प्रमाणवृत्तिमें विपर्ययवृत्ति नहीं है, परंतु राग-द्वेषादि क्लेशोंका वहाँ भी सद्भाव है, इसलिये भी विपर्ययवृत्ति और अविद्याकी एकता नहीं हो सकती; क्योंकि विपर्ययवृत्ति तो कभी होती है और कभी नहीं होती, किंतु अविद्या तो कैवल्य-अवस्थाकी प्राप्तितक निरन्तर विद्यमान रहती है। उसका नाश होनेपर तो सभी वृत्तियोंका धर्मी स्वयं चित्त भी अपने कारणमें विलीन हो जाता है (योग० ४। ३२)। परंतु प्रमाणवृत्तिके समय विपर्ययवृत्तिका अभाव हो जानेपर भी न तो राग-द्वेषोंका नाश होता है तथा न द्रष्टा और दृश्यके संयोगका ही। अतः यही मानना ठीक है कि चित्तका धर्मरूप विपर्ययवृत्ति अन्य पदार्थ है तथा पुरुष और प्रकृतिके संयोगकी कारणरूपा अविद्या उससे सर्वथा भिन्न है ॥८॥
समाधिपाद-१ ७
सम्बन्ध- अब विकल्पवृत्तिके लक्षण बतलाये जाते हैं—
शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ॥९॥
'जो ज्ञान शब्दजनित ज्ञानके साथ-साथ होनेवाला है और जिसका विषय वास्तवमें है ही नहीं, वह विकल्प है।'
व्याख्या— केवल शब्दके आधारपर बिना हुए पदार्थकी कल्पना करनेवाली जो चित्तकी वृत्ति है, वह विकल्पवृत्ति है। यह भी यदि वैराग्यकी वृद्धिमें हेतु, योगसाधनोंमें श्रद्धा और उत्साह बढ़ानेवाली तथा आत्मज्ञानमें सहायक हो तो अक्लिष्ट है, अन्यथा क्लिष्ट है।
आगम प्रमाणजनित वृत्तिसे होनेवाले संकल्पोंके सिवा सुनी-सुनायी बातोंके आधारपर मनुष्य जो नाना प्रकारके व्यर्थ संकल्प करता रहता है, उन सबको विकल्पवृत्तिके ही अन्तर्गत समझना चाहिये।
विपर्ययवृत्तिमें तो विद्यमान वस्तुके स्वरूपका विपरीत ज्ञान होता है और विकल्पवृत्तिमें अविद्यमान वस्तुकी शब्दज्ञानके आधारपर कल्पना होती है, यही विपर्यय और विकल्पका भेद है।
जैसे कोई मनुष्य सुनी-सुनायी बातोंके आधारपर अपनी मान्यताके अनुसार भगवान्के रूपकी कल्पना करके भगवान्का ध्यान करता है; पर जिस स्वरूपका वह ध्यान करता है, उसे न तो उसने देखा है और न वैसा कोई भगवान्का स्वरूप वास्तवमें है ही, केवल कल्पनामात्र ही है। यह विकल्पवृत्ति मनुष्यको भगवान्के चिन्तनमें लगानेवाली होनेसे अक्लिष्ट है; दूसरी जो भोगोंमें प्रवृत्त करनेवाली विकल्पवृत्तियाँ हैं, वे क्लिष्ट हैं। इसी प्रकार सभी वृत्तियोंमें क्लिष्ट और अक्लिष्टका भेद समझ लेना चाहिये ॥९॥
सम्बन्ध— अब निद्रावृत्तिके लक्षण बतलाये जाते हैं—
८ पातञ्जलयोगदर्शन
अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा ॥१०॥
'अभावके ज्ञानका अवलम्बन (ग्रहण) करनेवाली वृत्ति निद्रा है।'
व्याख्या—जिस समय मनुष्यको किसी भी विषयका ज्ञान नहीं रहता, केवलमात्र ज्ञानके अभावकी ही प्रतीति रहती है, वह ज्ञानके अभावका ज्ञान जिस चित्तवृत्तिके आश्रित रहता है, वह निद्रावृत्ति है।* निद्रा भी चित्तकी वृत्तिविशेष है, तभी तो मनुष्य गाढ़ निद्रासे उठकर कहता है कि मुझे आज ऐसी गाढ़ निद्रा आयी जिसमें किसी बातकी कोई खबर नहीं रही। इस स्मृतिवृत्तिसे ही यह सिद्ध होता है कि निद्रा भी एक वृत्ति है, नहीं तो जगनेपर उसकी स्मृति कैसे होती।
निद्रा भी क्लिष्ट और अक्लिष्ट—दो प्रकारकी होती है। जिस निद्रासे जगनेपर साधकके मन और इन्द्रियोंमें सात्त्विक भाव भर जाता है, आलस्यका नाम-निशान नहीं रहता तथा जो योगसाधनमें उपयोगी और आवश्यक मानी गयी है (गीता ६।१७) †, वह अक्लिष्ट है; दूसरे प्रकारकी निद्रा उस अवस्थामें परिश्रमके अभावका बोध कराकर आसक्ति उत्पन्न करनेवाली होनेसे क्लिष्ट है ॥१०॥
* दूसरे दर्शनकार निद्राको वृत्ति नहीं मानते, सुषुप्ति-अवस्था मानते हैं; अतः यह लक्ष्य करानेके लिये कि 'निद्रा भी वृत्ति है', सूत्रमें 'वृत्तिः' पदका प्रयोग किया गया है।
† युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥
'दुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका और यथायोग्य सोने तथा जागनेवालेका ही सिद्ध होता है।'
समाधिपाद-१ ९
सम्बन्ध— अब स्मृतिवृत्तिके लक्षण बतलाये जाते हैं—
अनुभूतविषयासंप्रमोषः स्मृतिः ॥११॥
'अनुभव किये हुए विषयका न छिपना अर्थात् प्रकट हो जाना स्मृति है।'
व्याख्या— उपर्युक्त प्रमाण, विपर्यय, विकल्प और निद्रा—इन चार प्रकारकी वृत्तियोंद्वारा अनुभवमें आये हुए विषयोंके जो संस्कार चित्तमें पड़े हैं, उनका पुनः किसी निमित्तको पाकर स्फुरित हो जाना ही स्मृति है। उपर्युक्त चार प्रकारकी वृत्तियोंके सिवा इस स्मृतिवृत्तिसे जो संस्कार चित्तपर पड़ते हैं, उनसे भी पुनः स्मृति-वृत्ति उत्पन्न होती है। स्मृतिवृत्ति भी क्लिष्ट और अक्लिष्ट—दोनों ही प्रकारकी होती है। जिस स्मरणसे मनुष्यका भोगोंमें वैराग्य होता है तथा जो योगसाधनोंमें श्रद्धा और उत्साह बढ़ानेवाला एवं आत्मज्ञानमें सहायक है, वह तो अक्लिष्ट है और जिससे भोगोंमें राग-द्वेष बढ़ता है, वह क्लिष्ट है।
स्वप्नको कोई-कोई स्मृतिवृत्ति मानते हैं, परन्तु स्वप्नमें जाग्रत्की भाँति सभी वृत्तियोंका आविर्भाव देखा जाता है; अतः उसका किसी एक वृत्तिमें अन्तर्भाव मानना उचित प्रतीत नहीं होता ॥११॥
सम्बन्ध— यहाँतक योगकी कर्तव्यता, योगके लक्षण और चित्तवृत्तियोंके लक्षण बतलाये गये; अब उन चित्तवृत्तियोंके निरोधका उपाय बतलाते हैं—
अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः ॥१२॥
'उन ( चित्तवृत्तियों ) का निरोध अभ्यास और वैराग्यसे होता है।'
१० पातञ्जलयोगदर्शन
**व्याख्या—**चित्तकी वृत्तियोंका सर्वथा निरोध करनेके लिये अभ्यास और वैराग्य—ये दो उपाय हैं। चित्तकी वृत्तियोंका प्रवाह परम्परागत संस्कारोंके बलसे सांसारिक भोगोंकी ओर चल रहा है, उस प्रवाहको रोकनेका उपाय वैराग्य है और उसे कल्याणमार्गमें ले जानेका उपाय अभ्यास है * ॥१२॥
**सम्बन्ध—**उक्त दोनों उपायोंमेंसे पहले अभ्यासका लक्षण बतलाते हैं—
तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः ॥१३॥
'उन दोनोंमेंसे जो (चित्तकी) स्थिरताके लिये प्रयत्न करना है, वह अभ्यास है।'
**व्याख्या—**जो स्वभावसे ही चञ्चल है, ऐसे मनको किसी एक ध्येयमें स्थिर करनेके लिये बारंबार चेष्टा करते रहनेका नाम 'अभ्यास' है। इसके प्रकार शास्त्रोंमें बहुत बतलाये गये हैं; इसी पादके ३२ वें सूत्रसे ३९ वें तक अभ्यासके कुछ भेदोंका वर्णन है; उनमेंसे जिस साधकके लिये जो सुगम हो, जिसमें उसकी स्वाभाविक रुचि और श्रद्धा हो, उसके लिये वही ठीक है ॥१३॥
* गीतामें भी कहा है—
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ (६।३५)
'हे कुन्तीपुत्र अर्जुन ! अभ्यास अर्थात् स्थितिके लिये बारंबार यत्न करनेसे और वैराग्यसे मन वशमें होता है, इसलिये इसको अवश्य वशमें करना चाहिये।'
समाधिपाद-१ <span style="float: right;">११</span>
सम्बन्ध—अब अभ्यासके दृढ़ होनेका प्रकार बतलाते हैं—
स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्काराऽऽसेवितो दृढभूमिः ॥१४॥
'परंतु वह (अभ्यास) बहुत कालतक निरन्तर (लगातार) और आदरपूर्वक साङ्गोपाङ्ग सेवन किया जानेपर दृढ़ अवस्थावाला होता है।'
व्याख्या—अपने साधनके अभ्यासको दृढ़ बनानेके लिये साधकको चाहिये कि साधनसे कभी उकतावे नहीं। यह दृढ़ विश्वास रक्खे कि किया हुआ अभ्यास कभी भी व्यर्थ नहीं हो सकता, अभ्यासके बलसे मनुष्य निःसन्देह अपने लक्ष्यकी प्राप्ति कर लेता है। यह समझकर अभ्यासके लिये कालकी अवधि न रक्खे, आजीवन अभ्यास करता रहे; साथ ही यह भी ध्यान रक्खे कि अभ्यासमें व्यवधान (अन्तर) न पड़ने पावे, निरन्तर (लगातार) अभ्यास चलता रहे। तथा अभ्यासमें तुच्छ बुद्धि न करे, उसकी अवहेलना न करे, बल्कि अभ्यासको ही अपने जीवनका आधार बनाकर अत्यन्त आदरपूर्वक उसे साङ्गोपाङ्ग करता रहे। इस प्रकार किया हुआ अभ्यास ही दृढ़ होता है ॥१४॥*
* इस सूत्रका भाव गीतामें इस प्रकार आया है—
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥ (६।२३)
'अर्थात् उस योगका अभ्यास बिना उकताये हुए चित्तसे निश्चयपूर्वक करते रहना चाहिये।'
| १२ | पातञ्जलयोगदर्शन |
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सम्बन्ध— अब वैराग्यके लक्षण आरम्भ करते हुए पहले अपर-वैराग्यके लक्षण बतलाते हैं—
दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् ॥ १५॥
'देखे और सुने हुए विषयोंमें सर्वथा तृष्णारहित चित्तकी जो वशीकार नामक अवस्था है, वह वैराग्य है।'
व्याख्या— अन्तःकरण और इन्द्रियोंके द्वारा प्रत्यक्ष अनुभवमें आनेवाले इस लोकके समस्त भोगोंका समाहार यहाँ 'दृष्ट' शब्दमें किया गया है और जो प्रत्यक्ष उपलब्ध नहीं हैं, जिनकी बड़ाई वेद, शास्त्र और भोगोंका अनुभव करनेवाले पुरुषोंसे सुनी गयी है, ऐसे भोग्य विषयोंका समाहार 'आनुश्रविक' शब्दमें किया गया है। उपर्युक्त दोनों प्रकारके भोगोंसे जब चित्त भलीभाँति तृष्णारहित हो जाता है, जब उनको प्राप्त करनेकी इच्छाका सर्वथा नाश हो जाता है, ऐसे कामनारहित चित्तकी जो वशीकार नामक अवस्थाविशेष है, वह 'अपर-वैराग्य' है ॥ १५॥
सम्बन्ध— अब परवैराग्यके लक्षण बतलाते हैं—
तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् ॥ १६॥
'पुरुषके ज्ञानसे जो प्रकृतिके गुणोंमें तृष्णाका सर्वथा अभाव हो जाना है, वह परवैराग्य है।'
व्याख्या— पहले बतलाये हुए चित्तकी वशीकार संज्ञारूप वैराग्यसे जब साधककी विषय-प्रवृत्तिका अभाव हो जाता है और
समाधिपाद-१ १३
उसके चित्तका प्रवाह समानभावसे अपने ध्येयके अनुभवमें एकाग्र हो जाता है (योग० ३ । १२) उसके बाद समाधि परिपक्व होनेपर प्रकृति और पुरुषविषयक विवेकज्ञान प्रकट होता है (योग० ३ । ३५); उसके होनेसे जब साधककी तीनों गुणोंमें और उनके कार्यमें किसी प्रकारकी किञ्चिन्मात्र भी तृष्णा नहीं रहती; (योग० ४ । २६) जब वह सर्वथा आप्तकाम निष्काम हो जाता है (योग० २ । २७), ऐसी सर्वथा रागरहित अवस्थाको 'परवैराग्य' कहते हैं* ॥१६॥
**सम्बन्ध—**इस प्रकार चित्तवृत्ति-निरोधके उपायोंका वर्णन करके अब चित्तवृत्तिनिरोधरूप निर्बीज योगका स्वरूप बतलानेके लिये पहले उसके पूर्वकी अवस्थाका संप्रज्ञात योगके नामसे अवान्तर भेदोंके सहित वर्णन करते हैं—
वितर्कविचारानन्दास्मितानुगमात्संप्रज्ञातः॥१७॥
'वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता—इन चारोंके सम्बन्धसे युक्त चित्तवृत्तिका समाधान संप्रज्ञात योग है।'
**व्याख्या—**संप्रज्ञातयोगके ध्येय पदार्थ तीन माने गये हैं— (१) ग्राह्य (इन्द्रियोंके स्थूल और सूक्ष्म विषय), (२) ग्रहण (इन्द्रियाँ और अन्तःकरण) तथा (३) ग्रहीता (बुद्धिके
* गीतामें भी योगारूढ-अवस्थाका वर्णन करते हुए कहा है—
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥ (६।४)
'जब योगी न तो इन्द्रियोंके विषयोंमें और न कर्मोंमें ही आसक्त होता है तथा सब प्रकारके संकल्पोंका भलीभाँति त्याग कर देता है, तब वह योगारूढ़ कहलाता है।'
| १४ | पातञ्जलयोगदर्शन |
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साथ एकरूप हुआ पुरुष ); ( योग० १ । ४१ ) । जब ग्राह्य पदार्थोंके स्थूल रूपमें समाधि की जाती है, उस समय समाधिमें जबतक शब्द, अर्थ और ज्ञानका विकल्प वर्तमान रहता है, तबतक तो वह सवितर्क समाधि है; और जब इनका विकल्प नहीं रहता, तब वही निर्वितर्क कही जाती है। इसी प्रकार जब ग्राह्य और ग्रहणके सूक्ष्मरूपमें समाधि की जाती है, उस समय उस समाधिमें जबतक शब्द, अर्थ और ज्ञानका विकल्प रहता है, तबतक वह सविचार और जब इनका विकल्प नहीं रहता, तब वही निर्विचार कही जाती है। जब निर्विचार समाधिमें विचारका सम्बन्ध तो नहीं रहता, परंतु आनन्दका अनुभव और अहङ्कारका सम्बन्ध रहता है, तबतक वह आनन्दानुगत समाधि है और जब उसमें आनन्दकी प्रतीति भी लुप्त हो जाती है, तब वही केवल अस्मितानुगत समझी जाती है। यही निर्विचार समाधिकी निर्मलता है। इनका विस्तृत विचार इसी पादके ४१ वें सूत्रसे ४९वें तक किया गया है ॥१७॥
**सम्बन्ध—**अब उस अन्तिम योगका स्वरूप बतलाते हैं, जिसके सिद्ध होनेपर द्रष्टाकी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है ( योग० १ । २ ), जो कि इस शास्त्रका मुख्य प्रतिपाद्य है, जिसे कैवल्य-अवस्था भी कहते हैं—
विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः॥१८॥
‘विराम प्रत्ययका अभ्यास जिसकी पूर्व अवस्था है और जिसमें चित्तका स्वरूप संस्कारमात्र ही शेष रहता है, वह योग अन्य है।’
समाधिपाद-१ १५
**व्याख्या—**साधकको जब परवैराग्यकी प्राप्ति हो जाती है, उस समय स्वभावसे ही चित्त संसारके पदार्थोंकी ओर नहीं जाता। वह उनसे अपने-आप उपरत हो जाता है। उस उपरत अवस्थाकी प्रतीतिका नाम ही यहाँ विराम-प्रत्यय है। इस उपरतिकी प्रतीतिका अभ्यास-क्रम भी जब बंद हो जाता है, उस समय चित्तकी वृत्तियों-का सर्वथा अभाव हो जाता है (योग० १ । ५१), केवलमात्र अन्तिम उपरत-अवस्थाके संस्कारोंसे युक्त चित्त रहता है (योग० ३ । ९-१०)। फिर निरोध-संस्कारोंके क्रमकी समाप्ति होनेसे वह चित्त भी अपने कारणमें लीन हो जाता है (योग० ४ । ३२–३४)। अतः प्रकृतिके संयोगका अभाव हो जानेपर द्रष्टाकी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है; इसीको असंप्रज्ञातयोग, निर्बीज समाधि (योग० १ । ५१) और कैवल्य-अवस्था (योग० २ । २५; ३ । ५०; ४ । ३४) आदि नामोंसे कहा गया है ॥१८॥
**सम्बन्ध—**यहाँतक योग और उसके साधनोंका संक्षेपमें वर्णन किया गया, अब किस प्रकारके साधकका उपर्युक्त योग शीघ्र-से-शीघ्र सिद्ध होता है, यह समझानेके लिये प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् ॥१९॥
‘विदेह और प्रकृतिलय योगियोंका (उपर्युक्त योग) भवप्रत्यय कहलाता है।’
**व्याख्या—**जो पूर्वजन्ममें योगका साधन करते-करते विदेह-अवस्थातक पहुँच चुके थे अर्थात् स्थूल शरीरके बन्धनसे छूटकर
१६ पातञ्जलयोगदर्शन
शरीरके बाहर स्थिर होनेका जिनका अभ्यास दृढ़ हो चुका था, जो 'महाविदेहा' स्थितिको प्राप्त कर चुके थे (योग० ३ । ४३), एवं जो साधन करते-करते 'प्रकृतिलय' (योग० १ । ४५; ३ । ४८) तककी स्थिति प्राप्त कर चुके थे, किंतु कैवल्यपदकी प्राप्ति होनेके पहले ही जिनकी मृत्यु हो गयी, उन दोनों प्रकारके योगियोंका जब पुनर्जन्म होता है, जब वे योगभ्रष्ट साधक पुनः योगिकुलमें जन्म ग्रहण करते हैं, तब उनको पूर्वजन्मके योगाभ्यास-विषयक संस्कारोंके प्रभावसे अपनी स्थितिका तत्काल ज्ञान हो जाता है (गीता ६ । ४२-४३), और वे साधनकी परम्पराके बिना ही निर्बीज समाधि-अवस्थाको प्राप्त कर लेते हैं। उनकी निर्बीज समाधि उपायजन्य नहीं है, अतः उसका नाम 'भवप्रत्यय' है अर्थात् वह ऐसी समाधि है कि जिसके सिद्ध होनेमें पुनः मनुष्यजन्म प्राप्त होना ही कारण है, साधन-समुदाय नहीं ॥१९॥
सम्बन्ध—दूसरे साधकोंका योग कैसे सिद्ध होता है; सो बतलाते हैं—
श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् २० •
'दूसरे साधकोंका (निरोधरूप योग) श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञापूर्वक (क्रमसे) सिद्ध होता है।'
व्याख्या—किसी भी साधनमें प्रवृत्त होनेका और अविचल भावसे उसमें लगे रहनेका मूल कारण श्रद्धा (भक्तिपूर्वक विश्वास) ही है। श्रद्धाकी कमीके कारण ही साधकके साधनकी उन्नतिमें विलम्ब होता है, अन्यथा कल्याणके साधनमें विलम्बका कोई कारण
समाधिपाद-१ १७
नहीं है । इसीलिये सूत्रकारने श्रद्धाको पहला स्थान दिया है । श्रद्धाके साथ साधकमें वीर्य अर्थात् मन, इन्द्रिय और शरीरका सामर्थ्य भी परम आवश्यक है; क्योंकि इसीसे साधकका उत्साह बढ़ता है । श्रद्धा और वीर्य—इन दोनोंका संयोग मिलनेपर साधक-की स्मरणशक्ति बलवती हो जाती है, तथा उसमें योग-साधनके संस्कारोंका ही बारंबार प्राकट्य होता रहता है; अतः उसका मन विषयोंसे विरक्त होकर समाहित हो जाता है, इसीको समाधि कहते हैं (योग० १ । ४६; ३ । ३ ) । इससे अन्तःकरण स्वच्छ हो जानेपर साधककी बुद्धि 'ऋतम्भरा'—सत्यको धारण करनेवाली हो जाती है (योग० १ । ४८) । अतएव पर-वैराग्यकी प्राप्तिपूर्वक उसका निर्बीज समाधिरूप योग सिद्ध हो जाता है । गीतामें भी कहा है—
'श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥' (४ । ३९)
'जितेन्द्रिय साधनपरायण और श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञानको प्राप्त होता है तथा ज्ञानको प्राप्त होकर वह बिना विलम्बके—तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है' ॥२०॥
सम्बन्ध—अब अभ्यास-वैराग्यकी अधिकताके कारण योगकी सिद्धि शीघ्र और अतिशीघ्र होनेकी बात कहते हैं—
तीव्रसंवेगानामासन्नः ॥२१॥
'जिनके साधनकी गति तीव्र है, उनकी (निर्बीज समाधि) शीघ्र (सिद्ध) होती है।'
व्याख्या—जिन पुरुषोंका साधन (अभ्यास और वैराग्य) तेजीसे चलता है, जो सब प्रकारकी विघ्न-बाधाओंको ठुकराकर अपने
पा० यो० द० २—
१८ | पातञ्जलयोगदर्शन
साधनमें तत्परतासे लगे रहते हैं, उनका योग शीघ्र सिद्ध होता है ॥२१॥
सम्बन्ध—किन्तु—
मृदुमध्याधिमात्रत्वात्ततोऽपि विशेषः ॥२२॥
'साधनकी मात्रा हल्की, मध्यम और उच्च होनेके कारण तीव्र संवेगवालोंमें भी कालका भेद हो जाता है।'
व्याख्या—किसका साधन किस दर्जेका है, इसपर भी योग-सिद्धिकी शीघ्रताका विभाग निर्भर करता है; क्योंकि क्रियात्मक अभ्यास और वैराग्य तीव्र होनेपर भी विवेक और भावकी न्यूनाधिकताके कारण समाधि सिद्ध होनेके कालमें भेद होना स्वाभाविक है। जिस साधकमें श्रद्धा, विवेकशक्ति और भाव साधारण हैं, उसका साधन मृदुमात्रावाला है; जिस साधकमें श्रद्धा, विवेकशक्ति और भाव कुछ उन्नत हैं, उसका साधन मध्यमात्रावाला है और जिस साधकमें श्रद्धा, विवेक और भाव अत्यन्त उन्नत हैं, उसका साधन अधिमात्रावाला है। साधनमें क्रियाकी अपेक्षा भावका अधिक महत्त्व है। अभ्यास और वैराग्यका जो क्रियात्मक बाह्य स्वरूप है, वह तो ऊपरवाले सूत्रमें 'वेग' के नामसे कहा गया है; और उनका जो भावात्मक आभ्यन्तर स्वरूप है, वह उनकी मात्रा यानी दर्जा है। व्यवहारमें भी देखा जाता है कि एक ही कामके लिये समानरूपसे परिश्रम किया जानेपर भी जो उसकी सिद्धिमें अधिक विश्वास रखता है, जिस मनुष्यको उस कामके करनेकी युक्तिका अधिक ज्ञान है एवं जो उसे प्रेम और उत्साहपूर्वक बिना उकताये करता रहता है,
समाधिपाद-१ १९
वह दूसरोंकी अपेक्षा उसे शीघ्र पूरा कर लेता है। यही बात समाधिकी सिद्धिमें भी समझ लेनी चाहिये।
समाधिकी प्राप्तिके लिये साधन करनेवालोंमें जिसका साधन श्रद्धा, विवेकशक्ति और भावकी अधिकता आदि हेतुओंके कारण जितने ऊँचे दर्जेका है और जिसकी चालका क्रम जितना तेज है, उसीके अनुसार वह शीघ्र या अतिशीघ्र समाधिकी प्राप्ति कर सकेगा। यही बात समझानेके लिये सूत्रकारने उपर्युक्त दो सूत्र कहे हैं। अतः साधकको चाहिये कि अपने साधनको सर्वथा निर्दोष बनानेकी चेष्टा रक्खे, उसमें किसी प्रकारकी भी शिथिलता न आने दे ॥२२॥
**सम्बन्ध—**अब पूर्वोक्त अभ्यास और वैराग्यकी अपेक्षा निर्बीज समाधिका सुगम उपाय बताया जाता है—
ईश्वरप्रणिधानाद्वा ॥२३॥
'इसके सिवा ईश्वरप्रणिधानसे भी (निर्बीज समाधिकी सिद्धि शीघ्र हो सकती है)।'
**व्याख्या—**ईश्वरकी भक्ति यानी शरणागतिका नाम 'ईश्वरप्रणिधान' है; (देखिये योग० २।१ की व्याख्या) इससे भी निर्बीज समाधि शीघ्र सिद्ध हो सकती है। (योग० २।४५) क्योंकि ईश्वर सर्वसमर्थ हैं, वे अपने शरणापन्न भक्तपर प्रसन्न होकर उसकी भावनानुसार सब कुछ प्रदान कर सकते हैं (गीता ४।११*) ॥२३॥
* ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
'जो मेरेको जैसे भजते हैं, मैं भी उनको वैसे ही भजता हूँ।'
| २० | पातञ्जलयोगदर्शन |
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सम्बन्ध—अब उक्त ईश्वरके लक्षण बतलाते हैं—
क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ॥ २४ ॥
'जो क्लेश, कर्म, विपाक और आशयके सम्बन्धसे रहित तथा समस्त पुरुषोंसे उत्तम है, वह ईश्वर है।'
व्याख्या—अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश—ये पाँच 'क्लेश' हैं; इनका विस्तृत वर्णन दूसरे पादके तीसरे सूत्रसे नवेंतक है। 'कर्म' चार प्रकारके हैं—पुण्य, पाप, पुण्य और पाप-मिश्रित तथा पुण्य-पापसे रहित (योग० ४ । ७), कर्मोंके फलका नाम 'विपाक' है (योग० २ । १३) और कर्मोंके संस्कारोंका नाम 'आशय' है (योग० २ । १२)। समस्त जीवोंका इन चारोंसे अनादि सम्बन्ध है। यद्यपि मुक्त जीवोंका पीछे सम्बन्ध नहीं रहता, तो भी पहले सम्बन्ध था ही; किन्तु ईश्वरका तो कभी भी इनसे न सम्बन्ध था, न है और न होनेवाला है; इस कारण उन मुक्त पुरुषोंसे भी ईश्वर विशेष है, यह बात प्रकट करनेके लिये ही सूत्रकारने 'पुरुषविशेषः' पदका प्रयोग किया है ॥२४॥
सम्बन्ध—ईश्वरकी विशेषताका पुनः प्रतिपादन करते हैं—
तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम् ॥ २५ ॥
'उस (ईश्वर) में सर्वज्ञताका कारण (ज्ञान) निरतिशय है।'
व्याख्या—जिससे बढ़कर कोई दूसरी वस्तु हो, वह सातिशय
समाधिपाद-१ २१
है और जिससे बड़ा कोई नहीं हो, वह निरतिशय है । ईश्वर ज्ञानकी अवधि है, उसका ज्ञान सबसे बढ़कर है; उसके ज्ञानसे बढ़कर किसीका भी ज्ञान नहीं है, इसलिये उसे निरतिशय कहा गया है । जिस प्रकार ईश्वरमें ज्ञानकी पराकाष्ठा है, उसी प्रकार धर्म, वैराग्य, यश और ऐश्वर्य आदिकी पराकाष्ठाका आधार भी उसीको समझना चाहिये ॥२५॥
सम्बन्ध— और भी उसकी विशेषताका प्रतिपादन करते हैं—
पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् ॥ २६॥
‘( वह ) ईश्वर ( सबके ) पूर्वजोंका भी गुरु है; क्योंकि उसका कालसे अवच्छेद नहीं है ।’
व्याख्या— सर्गके आदिमें उत्पन्न होनेके कारण सबका गुरु ब्रह्माको माना जाता है, परंतु उसका कालसे अवच्छेद है ( गीता ८ । १७ )। ईश्वर स्वयं अनादि और अन्य सबका आदि है ( गीता १० । २-३ ); वह कालकी सीमासे सर्वथा अतीत है, वहाँतक कालकी पहुँच नहीं है; क्योंकि वह कालका भी महाकाल है । इसलिये वह सम्पूर्ण पूर्वजोंका भी गुरु यानी सबसे बड़ा, सबसे पुराना और सबको शिक्षा देनेवाला है ॥२६॥
सम्बन्ध— ईश्वरकी शरणागतिका प्रकार बतलानेके लिये उसके नामका वर्णन करते हैं—
तस्य वाचकः प्रणवः ॥ २७॥
‘उस ईश्वरका वाचक ( नाम ) प्रणव ( ॐकार ) है ।’