पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ पातञ्जलयोगदर्शन
शरीरके बाहर स्थिर होनेका जिनका अभ्यास दृढ़ हो चुका था, जो 'महाविदेहा' स्थितिको प्राप्त कर चुके थे (योग० ३ । ४३), एवं जो साधन करते-करते 'प्रकृतिलय' (योग० १ । ४५; ३ । ४८) तककी स्थिति प्राप्त कर चुके थे, किंतु कैवल्यपदकी प्राप्ति होनेके पहले ही जिनकी मृत्यु हो गयी, उन दोनों प्रकारके योगियोंका जब पुनर्जन्म होता है, जब वे योगभ्रष्ट साधक पुनः योगिकुलमें जन्म ग्रहण करते हैं, तब उनको पूर्वजन्मके योगाभ्यास-विषयक संस्कारोंके प्रभावसे अपनी स्थितिका तत्काल ज्ञान हो जाता है (गीता ६ । ४२-४३), और वे साधनकी परम्पराके बिना ही निर्बीज समाधि-अवस्थाको प्राप्त कर लेते हैं। उनकी निर्बीज समाधि उपायजन्य नहीं है, अतः उसका नाम 'भवप्रत्यय' है अर्थात् वह ऐसी समाधि है कि जिसके सिद्ध होनेमें पुनः मनुष्यजन्म प्राप्त होना ही कारण है, साधन-समुदाय नहीं ॥१९॥
सम्बन्ध—दूसरे साधकोंका योग कैसे सिद्ध होता है; सो बतलाते हैं—
श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् २० •
'दूसरे साधकोंका (निरोधरूप योग) श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञापूर्वक (क्रमसे) सिद्ध होता है।'
व्याख्या—किसी भी साधनमें प्रवृत्त होनेका और अविचल भावसे उसमें लगे रहनेका मूल कारण श्रद्धा (भक्तिपूर्वक विश्वास) ही है। श्रद्धाकी कमीके कारण ही साधकके साधनकी उन्नतिमें विलम्ब होता है, अन्यथा कल्याणके साधनमें विलम्बका कोई कारण