पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमाधिपाद-१ १५
**व्याख्या—**साधकको जब परवैराग्यकी प्राप्ति हो जाती है, उस समय स्वभावसे ही चित्त संसारके पदार्थोंकी ओर नहीं जाता। वह उनसे अपने-आप उपरत हो जाता है। उस उपरत अवस्थाकी प्रतीतिका नाम ही यहाँ विराम-प्रत्यय है। इस उपरतिकी प्रतीतिका अभ्यास-क्रम भी जब बंद हो जाता है, उस समय चित्तकी वृत्तियों-का सर्वथा अभाव हो जाता है (योग० १ । ५१), केवलमात्र अन्तिम उपरत-अवस्थाके संस्कारोंसे युक्त चित्त रहता है (योग० ३ । ९-१०)। फिर निरोध-संस्कारोंके क्रमकी समाप्ति होनेसे वह चित्त भी अपने कारणमें लीन हो जाता है (योग० ४ । ३२–३४)। अतः प्रकृतिके संयोगका अभाव हो जानेपर द्रष्टाकी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है; इसीको असंप्रज्ञातयोग, निर्बीज समाधि (योग० १ । ५१) और कैवल्य-अवस्था (योग० २ । २५; ३ । ५०; ४ । ३४) आदि नामोंसे कहा गया है ॥१८॥
**सम्बन्ध—**यहाँतक योग और उसके साधनोंका संक्षेपमें वर्णन किया गया, अब किस प्रकारके साधकका उपर्युक्त योग शीघ्र-से-शीघ्र सिद्ध होता है, यह समझानेके लिये प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् ॥१९॥
‘विदेह और प्रकृतिलय योगियोंका (उपर्युक्त योग) भवप्रत्यय कहलाता है।’
**व्याख्या—**जो पूर्वजन्ममें योगका साधन करते-करते विदेह-अवस्थातक पहुँच चुके थे अर्थात् स्थूल शरीरके बन्धनसे छूटकर