भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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१४पातञ्जलयोगदर्शन

साथ एकरूप हुआ पुरुष ); ( योग० १ । ४१ ) । जब ग्राह्य पदार्थोंके स्थूल रूपमें समाधि की जाती है, उस समय समाधिमें जबतक शब्द, अर्थ और ज्ञानका विकल्प वर्तमान रहता है, तबतक तो वह सवितर्क समाधि है; और जब इनका विकल्प नहीं रहता, तब वही निर्वितर्क कही जाती है। इसी प्रकार जब ग्राह्य और ग्रहणके सूक्ष्मरूपमें समाधि की जाती है, उस समय उस समाधिमें जबतक शब्द, अर्थ और ज्ञानका विकल्प रहता है, तबतक वह सविचार और जब इनका विकल्प नहीं रहता, तब वही निर्विचार कही जाती है। जब निर्विचार समाधिमें विचारका सम्बन्ध तो नहीं रहता, परंतु आनन्दका अनुभव और अहङ्कारका सम्बन्ध रहता है, तबतक वह आनन्दानुगत समाधि है और जब उसमें आनन्दकी प्रतीति भी लुप्त हो जाती है, तब वही केवल अस्मितानुगत समझी जाती है। यही निर्विचार समाधिकी निर्मलता है। इनका विस्तृत विचार इसी पादके ४१ वें सूत्रसे ४९वें तक किया गया है ॥१७॥

**सम्बन्ध—**अब उस अन्तिम योगका स्वरूप बतलाते हैं, जिसके सिद्ध होनेपर द्रष्टाकी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है ( योग० १ । २ ), जो कि इस शास्त्रका मुख्य प्रतिपाद्य है, जिसे कैवल्य-अवस्था भी कहते हैं—

विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः॥१८॥

‘विराम प्रत्ययका अभ्यास जिसकी पूर्व अवस्था है और जिसमें चित्तका स्वरूप संस्कारमात्र ही शेष रहता है, वह योग अन्य है।’