पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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साथ एकरूप हुआ पुरुष ); ( योग० १ । ४१ ) । जब ग्राह्य पदार्थोंके स्थूल रूपमें समाधि की जाती है, उस समय समाधिमें जबतक शब्द, अर्थ और ज्ञानका विकल्प वर्तमान रहता है, तबतक तो वह सवितर्क समाधि है; और जब इनका विकल्प नहीं रहता, तब वही निर्वितर्क कही जाती है। इसी प्रकार जब ग्राह्य और ग्रहणके सूक्ष्मरूपमें समाधि की जाती है, उस समय उस समाधिमें जबतक शब्द, अर्थ और ज्ञानका विकल्प रहता है, तबतक वह सविचार और जब इनका विकल्प नहीं रहता, तब वही निर्विचार कही जाती है। जब निर्विचार समाधिमें विचारका सम्बन्ध तो नहीं रहता, परंतु आनन्दका अनुभव और अहङ्कारका सम्बन्ध रहता है, तबतक वह आनन्दानुगत समाधि है और जब उसमें आनन्दकी प्रतीति भी लुप्त हो जाती है, तब वही केवल अस्मितानुगत समझी जाती है। यही निर्विचार समाधिकी निर्मलता है। इनका विस्तृत विचार इसी पादके ४१ वें सूत्रसे ४९वें तक किया गया है ॥१७॥
**सम्बन्ध—**अब उस अन्तिम योगका स्वरूप बतलाते हैं, जिसके सिद्ध होनेपर द्रष्टाकी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है ( योग० १ । २ ), जो कि इस शास्त्रका मुख्य प्रतिपाद्य है, जिसे कैवल्य-अवस्था भी कहते हैं—
विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः॥१८॥
‘विराम प्रत्ययका अभ्यास जिसकी पूर्व अवस्था है और जिसमें चित्तका स्वरूप संस्कारमात्र ही शेष रहता है, वह योग अन्य है।’
समाधिपाद-१ १५
**व्याख्या—**साधकको जब परवैराग्यकी प्राप्ति हो जाती है, उस समय स्वभावसे ही चित्त संसारके पदार्थोंकी ओर नहीं जाता। वह उनसे अपने-आप उपरत हो जाता है। उस उपरत अवस्थाकी प्रतीतिका नाम ही यहाँ विराम-प्रत्यय है। इस उपरतिकी प्रतीतिका अभ्यास-क्रम भी जब बंद हो जाता है, उस समय चित्तकी वृत्तियों-का सर्वथा अभाव हो जाता है (योग० १ । ५१), केवलमात्र अन्तिम उपरत-अवस्थाके संस्कारोंसे युक्त चित्त रहता है (योग० ३ । ९-१०)। फिर निरोध-संस्कारोंके क्रमकी समाप्ति होनेसे वह चित्त भी अपने कारणमें लीन हो जाता है (योग० ४ । ३२–३४)। अतः प्रकृतिके संयोगका अभाव हो जानेपर द्रष्टाकी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है; इसीको असंप्रज्ञातयोग, निर्बीज समाधि (योग० १ । ५१) और कैवल्य-अवस्था (योग० २ । २५; ३ । ५०; ४ । ३४) आदि नामोंसे कहा गया है ॥१८॥
**सम्बन्ध—**यहाँतक योग और उसके साधनोंका संक्षेपमें वर्णन किया गया, अब किस प्रकारके साधकका उपर्युक्त योग शीघ्र-से-शीघ्र सिद्ध होता है, यह समझानेके लिये प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् ॥१९॥
‘विदेह और प्रकृतिलय योगियोंका (उपर्युक्त योग) भवप्रत्यय कहलाता है।’
**व्याख्या—**जो पूर्वजन्ममें योगका साधन करते-करते विदेह-अवस्थातक पहुँच चुके थे अर्थात् स्थूल शरीरके बन्धनसे छूटकर
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शरीरके बाहर स्थिर होनेका जिनका अभ्यास दृढ़ हो चुका था, जो 'महाविदेहा' स्थितिको प्राप्त कर चुके थे (योग० ३ । ४३), एवं जो साधन करते-करते 'प्रकृतिलय' (योग० १ । ४५; ३ । ४८) तककी स्थिति प्राप्त कर चुके थे, किंतु कैवल्यपदकी प्राप्ति होनेके पहले ही जिनकी मृत्यु हो गयी, उन दोनों प्रकारके योगियोंका जब पुनर्जन्म होता है, जब वे योगभ्रष्ट साधक पुनः योगिकुलमें जन्म ग्रहण करते हैं, तब उनको पूर्वजन्मके योगाभ्यास-विषयक संस्कारोंके प्रभावसे अपनी स्थितिका तत्काल ज्ञान हो जाता है (गीता ६ । ४२-४३), और वे साधनकी परम्पराके बिना ही निर्बीज समाधि-अवस्थाको प्राप्त कर लेते हैं। उनकी निर्बीज समाधि उपायजन्य नहीं है, अतः उसका नाम 'भवप्रत्यय' है अर्थात् वह ऐसी समाधि है कि जिसके सिद्ध होनेमें पुनः मनुष्यजन्म प्राप्त होना ही कारण है, साधन-समुदाय नहीं ॥१९॥
सम्बन्ध—दूसरे साधकोंका योग कैसे सिद्ध होता है; सो बतलाते हैं—
श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् २० •
'दूसरे साधकोंका (निरोधरूप योग) श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञापूर्वक (क्रमसे) सिद्ध होता है।'
व्याख्या—किसी भी साधनमें प्रवृत्त होनेका और अविचल भावसे उसमें लगे रहनेका मूल कारण श्रद्धा (भक्तिपूर्वक विश्वास) ही है। श्रद्धाकी कमीके कारण ही साधकके साधनकी उन्नतिमें विलम्ब होता है, अन्यथा कल्याणके साधनमें विलम्बका कोई कारण
समाधिपाद-१ १७
नहीं है । इसीलिये सूत्रकारने श्रद्धाको पहला स्थान दिया है । श्रद्धाके साथ साधकमें वीर्य अर्थात् मन, इन्द्रिय और शरीरका सामर्थ्य भी परम आवश्यक है; क्योंकि इसीसे साधकका उत्साह बढ़ता है । श्रद्धा और वीर्य—इन दोनोंका संयोग मिलनेपर साधक-की स्मरणशक्ति बलवती हो जाती है, तथा उसमें योग-साधनके संस्कारोंका ही बारंबार प्राकट्य होता रहता है; अतः उसका मन विषयोंसे विरक्त होकर समाहित हो जाता है, इसीको समाधि कहते हैं (योग० १ । ४६; ३ । ३ ) । इससे अन्तःकरण स्वच्छ हो जानेपर साधककी बुद्धि 'ऋतम्भरा'—सत्यको धारण करनेवाली हो जाती है (योग० १ । ४८) । अतएव पर-वैराग्यकी प्राप्तिपूर्वक उसका निर्बीज समाधिरूप योग सिद्ध हो जाता है । गीतामें भी कहा है—
'श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥' (४ । ३९)
'जितेन्द्रिय साधनपरायण और श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञानको प्राप्त होता है तथा ज्ञानको प्राप्त होकर वह बिना विलम्बके—तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है' ॥२०॥
सम्बन्ध—अब अभ्यास-वैराग्यकी अधिकताके कारण योगकी सिद्धि शीघ्र और अतिशीघ्र होनेकी बात कहते हैं—
तीव्रसंवेगानामासन्नः ॥२१॥
'जिनके साधनकी गति तीव्र है, उनकी (निर्बीज समाधि) शीघ्र (सिद्ध) होती है।'
व्याख्या—जिन पुरुषोंका साधन (अभ्यास और वैराग्य) तेजीसे चलता है, जो सब प्रकारकी विघ्न-बाधाओंको ठुकराकर अपने
पा० यो० द० २—
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साधनमें तत्परतासे लगे रहते हैं, उनका योग शीघ्र सिद्ध होता है ॥२१॥
सम्बन्ध—किन्तु—
मृदुमध्याधिमात्रत्वात्ततोऽपि विशेषः ॥२२॥
'साधनकी मात्रा हल्की, मध्यम और उच्च होनेके कारण तीव्र संवेगवालोंमें भी कालका भेद हो जाता है।'
व्याख्या—किसका साधन किस दर्जेका है, इसपर भी योग-सिद्धिकी शीघ्रताका विभाग निर्भर करता है; क्योंकि क्रियात्मक अभ्यास और वैराग्य तीव्र होनेपर भी विवेक और भावकी न्यूनाधिकताके कारण समाधि सिद्ध होनेके कालमें भेद होना स्वाभाविक है। जिस साधकमें श्रद्धा, विवेकशक्ति और भाव साधारण हैं, उसका साधन मृदुमात्रावाला है; जिस साधकमें श्रद्धा, विवेकशक्ति और भाव कुछ उन्नत हैं, उसका साधन मध्यमात्रावाला है और जिस साधकमें श्रद्धा, विवेक और भाव अत्यन्त उन्नत हैं, उसका साधन अधिमात्रावाला है। साधनमें क्रियाकी अपेक्षा भावका अधिक महत्त्व है। अभ्यास और वैराग्यका जो क्रियात्मक बाह्य स्वरूप है, वह तो ऊपरवाले सूत्रमें 'वेग' के नामसे कहा गया है; और उनका जो भावात्मक आभ्यन्तर स्वरूप है, वह उनकी मात्रा यानी दर्जा है। व्यवहारमें भी देखा जाता है कि एक ही कामके लिये समानरूपसे परिश्रम किया जानेपर भी जो उसकी सिद्धिमें अधिक विश्वास रखता है, जिस मनुष्यको उस कामके करनेकी युक्तिका अधिक ज्ञान है एवं जो उसे प्रेम और उत्साहपूर्वक बिना उकताये करता रहता है,
समाधिपाद-१ १९
वह दूसरोंकी अपेक्षा उसे शीघ्र पूरा कर लेता है। यही बात समाधिकी सिद्धिमें भी समझ लेनी चाहिये।
समाधिकी प्राप्तिके लिये साधन करनेवालोंमें जिसका साधन श्रद्धा, विवेकशक्ति और भावकी अधिकता आदि हेतुओंके कारण जितने ऊँचे दर्जेका है और जिसकी चालका क्रम जितना तेज है, उसीके अनुसार वह शीघ्र या अतिशीघ्र समाधिकी प्राप्ति कर सकेगा। यही बात समझानेके लिये सूत्रकारने उपर्युक्त दो सूत्र कहे हैं। अतः साधकको चाहिये कि अपने साधनको सर्वथा निर्दोष बनानेकी चेष्टा रक्खे, उसमें किसी प्रकारकी भी शिथिलता न आने दे ॥२२॥
**सम्बन्ध—**अब पूर्वोक्त अभ्यास और वैराग्यकी अपेक्षा निर्बीज समाधिका सुगम उपाय बताया जाता है—
ईश्वरप्रणिधानाद्वा ॥२३॥
'इसके सिवा ईश्वरप्रणिधानसे भी (निर्बीज समाधिकी सिद्धि शीघ्र हो सकती है)।'
**व्याख्या—**ईश्वरकी भक्ति यानी शरणागतिका नाम 'ईश्वरप्रणिधान' है; (देखिये योग० २।१ की व्याख्या) इससे भी निर्बीज समाधि शीघ्र सिद्ध हो सकती है। (योग० २।४५) क्योंकि ईश्वर सर्वसमर्थ हैं, वे अपने शरणापन्न भक्तपर प्रसन्न होकर उसकी भावनानुसार सब कुछ प्रदान कर सकते हैं (गीता ४।११*) ॥२३॥
* ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
'जो मेरेको जैसे भजते हैं, मैं भी उनको वैसे ही भजता हूँ।'
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सम्बन्ध—अब उक्त ईश्वरके लक्षण बतलाते हैं—
क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ॥ २४ ॥
'जो क्लेश, कर्म, विपाक और आशयके सम्बन्धसे रहित तथा समस्त पुरुषोंसे उत्तम है, वह ईश्वर है।'
व्याख्या—अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश—ये पाँच 'क्लेश' हैं; इनका विस्तृत वर्णन दूसरे पादके तीसरे सूत्रसे नवेंतक है। 'कर्म' चार प्रकारके हैं—पुण्य, पाप, पुण्य और पाप-मिश्रित तथा पुण्य-पापसे रहित (योग० ४ । ७), कर्मोंके फलका नाम 'विपाक' है (योग० २ । १३) और कर्मोंके संस्कारोंका नाम 'आशय' है (योग० २ । १२)। समस्त जीवोंका इन चारोंसे अनादि सम्बन्ध है। यद्यपि मुक्त जीवोंका पीछे सम्बन्ध नहीं रहता, तो भी पहले सम्बन्ध था ही; किन्तु ईश्वरका तो कभी भी इनसे न सम्बन्ध था, न है और न होनेवाला है; इस कारण उन मुक्त पुरुषोंसे भी ईश्वर विशेष है, यह बात प्रकट करनेके लिये ही सूत्रकारने 'पुरुषविशेषः' पदका प्रयोग किया है ॥२४॥
सम्बन्ध—ईश्वरकी विशेषताका पुनः प्रतिपादन करते हैं—
तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम् ॥ २५ ॥
'उस (ईश्वर) में सर्वज्ञताका कारण (ज्ञान) निरतिशय है।'
व्याख्या—जिससे बढ़कर कोई दूसरी वस्तु हो, वह सातिशय
समाधिपाद-१ २१
है और जिससे बड़ा कोई नहीं हो, वह निरतिशय है । ईश्वर ज्ञानकी अवधि है, उसका ज्ञान सबसे बढ़कर है; उसके ज्ञानसे बढ़कर किसीका भी ज्ञान नहीं है, इसलिये उसे निरतिशय कहा गया है । जिस प्रकार ईश्वरमें ज्ञानकी पराकाष्ठा है, उसी प्रकार धर्म, वैराग्य, यश और ऐश्वर्य आदिकी पराकाष्ठाका आधार भी उसीको समझना चाहिये ॥२५॥
सम्बन्ध— और भी उसकी विशेषताका प्रतिपादन करते हैं—
पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् ॥ २६॥
‘( वह ) ईश्वर ( सबके ) पूर्वजोंका भी गुरु है; क्योंकि उसका कालसे अवच्छेद नहीं है ।’
व्याख्या— सर्गके आदिमें उत्पन्न होनेके कारण सबका गुरु ब्रह्माको माना जाता है, परंतु उसका कालसे अवच्छेद है ( गीता ८ । १७ )। ईश्वर स्वयं अनादि और अन्य सबका आदि है ( गीता १० । २-३ ); वह कालकी सीमासे सर्वथा अतीत है, वहाँतक कालकी पहुँच नहीं है; क्योंकि वह कालका भी महाकाल है । इसलिये वह सम्पूर्ण पूर्वजोंका भी गुरु यानी सबसे बड़ा, सबसे पुराना और सबको शिक्षा देनेवाला है ॥२६॥
सम्बन्ध— ईश्वरकी शरणागतिका प्रकार बतलानेके लिये उसके नामका वर्णन करते हैं—
तस्य वाचकः प्रणवः ॥ २७॥
‘उस ईश्वरका वाचक ( नाम ) प्रणव ( ॐकार ) है ।’
२२ पातञ्जलयोगदर्शन
**व्याख्या—**नाम और नामीका सम्बन्ध अनादि और बड़ा ही घनिष्ठ है । इसी कारण शास्त्रोंमें नाम-जपकी बड़ी महिमा है (तुलसी० बाल० दोहा १८ से २७), गीतामें भी जपयज्ञ-को सब यज्ञोंसे श्रेष्ठ बतलाया है (१० । २५), 'ॐ' उस परमेश्वरका वेदोक्त नाम होनेसे मुख्य है (गीता १७ । २३; कठ० १ । २ । १५-१७) इस कारण यहाँ उसीका वर्णन किया गया है। इसी वर्णनसे श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि जितने भी ईश्वरके नाम हैं, उनके जपका भी माहात्म्य समझ लेना चाहिये ॥२७॥
**सम्बन्ध—**ईश्वरका नाम बतलाकर अब उसके प्रयोगकी विधि बतलाते हैं—
तज्जपस्तदर्थभावनम् ॥२८॥
'उस ॐकारका जप और उसके अर्थस्वरूप परमेश्वरका चिन्तन करना चाहिये।'
**व्याख्या—**यही पूर्वोक्त ईश्वरप्रणिधान अर्थात् ईश्वरकी भक्ति या शरणागति है। ईश्वरकी भक्तिके और भी बहुत-से प्रकार हैं, परन्तु यह सब साधनोंमें मुख्य होनेके कारण यहाँ सूत्रकारने केवल नाम और नामीके स्मरणरूप एक ही प्रकारका वर्णन किया है। गीतामें भी इसी तरह वर्णन आया है (८ । १३)। इसे उपलक्षण मानकर भगवद्भक्तिके सभी साधनोंको ईश्वरकी प्रसन्नताके हेतु होनेसे निर्बीज समाधिकी सिद्धिके हेतु समझना चाहिये अर्थात् ईश्वर-की भक्तिके सभी अङ्ग-प्रत्यङ्गोंका ईश्वरप्रणिधानमें अन्तर्भाव समझना चाहिये ॥२८॥
समाधिपाद-१ २३
सम्बन्ध— अब ईश्वरके नाम-जप और स्वरूपचिन्तनका फल वर्णन करते हैं—
ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च ॥२९॥
'उक्त साधनसे विघ्नोंका अभाव और आत्माके स्वरूपका ज्ञान भी हो जाता है।'
व्याख्या— अगले दो सूत्रोंमें जिन विघ्नोंका वर्णन विस्तारपूर्वक किया गया है, ईश्वरके भजन-स्मरणसे उनका अपने-आप नाश हो जाता है और आत्माके स्वरूपका ज्ञान होकर कैवल्य-अवस्था भी उपलब्ध हो जाती है; अतः यह निर्बीज समाधिकी प्राप्तिका बहुत ही सुगम उपाय है ॥२९॥
सम्बन्ध— पूर्वसूत्रमें जिन अन्तरायोंका अभाव होनेकी बात कही गयी है, उनके नाम बतलाये जाते हैं—
व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शना-
लब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपा-
स्तेऽन्तरायाः ॥३०॥
'व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व और अनवस्थितत्व—ये नौ चित्तके विक्षेप हैं, ये ही अन्तराय (विघ्न) हैं।'
व्याख्या— योगसाधनमें लगे हुए साधकके चित्तमें विक्षेप
२४ पातञ्जलयोगदर्शन
उत्पन्न करके उसको साधनसे विचलित करनेवाले ये नौ योगमार्गके विघ्न माने गये हैं।
( १ ) शरीर, इन्द्रियसमुदाय और चित्तमें किसी प्रकारका रोग उत्पन्न हो जाना 'व्याधि' है।
( २ ) अकर्मण्यता अर्थात् साधनोंमें प्रवृत्ति न होनेका स्वभाव 'स्त्यान' है।
( ३ ) अपनी शक्तिमें या योगके फलमें सन्देह हो जानेका नाम 'संशय' है।
( ४ ) योगसाधनोंके अनुष्ठानकी अवहेलना ( बेपरवाही ) करते रहना 'प्रमाद' है।
( ५ ) तमोगुणकी अधिकतासे चित्त और शरीरमें भारीपन हो जाना और उसके कारण साधनमें प्रवृत्तिका न होना 'आलस्य' है।
( ६ ) विषयोंके साथ इन्द्रियोंका संयोग होनेसे उनमें आसक्ति हो जानेके कारण जो चित्तमें वैराग्यका अभाव हो जाता है, उसे 'अविरति' कहते हैं।
( ७ ) योगके साधनोंको किसी कारणसे विपरीत समझना अर्थात् यह साधन ठीक नहीं है, ऐसा मिथ्या ज्ञान हो जाना 'भ्रान्तिदर्शन' है।
( ८ ) साधन करनेपर भी योगकी भूमिकाओंका अर्थात् साधनकी स्थितिका प्राप्त न होना—यह 'अलब्धभूमिकत्व' है; इससे साधकका उत्साह कम हो जाता है।
समाधिपाद-१ २५
( ९ ) योगसाधनसे किसी भूमिमें चित्तकी स्थिति होनेपर भी उसका न ठहरना 'अनवस्थितत्व' है ।
इन नौ प्रकारके चित्त-विक्षेपोंको ही अन्तराय, विघ्न, योगके प्रतिपक्षी आदि नामोंसे कहा जाता है ॥३०॥
सम्बन्ध—इनके साथ-साथ होनेवाले दूसरे विघ्नोंका वर्णन करते हैं—
दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेप-सहभुवः ॥३१॥
'दुःख, दौर्मनस्य, अङ्गमेजयत्व, श्वास और प्रश्वास—ये पाँच विघ्न विक्षेपोंके साथ-साथ होनेवाले हैं।'
व्याख्या—( १ ) दुःख—आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक—इस तरह दुःखके प्रधानतया तीन भेद माने गये हैं। काम-क्रोधादिके कारण, व्याधि आदिके कारण या इन्द्रियोंमें किसी प्रकारकी विकलता होनेके कारण जो मन, इन्द्रिय या शरीरमें ताप या पीड़ा होती है, उसको 'आध्यात्मिक दुःख' कहते हैं। मनुष्य, पशु, पक्षी, सिंह, व्याघ्र, मच्छर और अन्यान्य जीवोंके कारण होनेवाली पीड़ाका नाम 'आधिभौतिक दुःख' है। तथा सर्दी, गर्मी, वर्षा, भूकम्प आदि दैवी घटनासे होनेवाली पीड़ाका नाम 'आधिदैविक दुःख' है।
( २ ) दौर्मनस्य—इच्छाकी पूर्ति न होनेपर जो मनमें क्षोभ होता है, उसे 'दौर्मनस्य' कहते हैं।
२६ पातञ्जलयोगदर्शन
( ३ ) अङ्गमेजयत्व—शरीरके अङ्गोंमें कम्प होना 'अङ्गमेजयत्व' है।
( ४ ) श्वास—विना इच्छाके बाहरकी वायुका भीतर प्रवेश कर जाना अर्थात् बाहरी कुम्भकमें विघ्न हो जाना 'श्वास' है।
( ५ ) प्रश्वास—बिना इच्छाके ही भीतरकी वायुका बाहर निकल जाना अर्थात् भीतरी कुम्भकमें विघ्न हो जाना 'प्रश्वास' है।
ये पाँचों विक्षिप्त चित्तमें ही होते हैं, समाहित चित्तमें नहीं; इसलिये इनको 'विक्षेपसहभू' कहते हैं ॥३१॥
सम्बन्ध—उक्त विघ्नोंको दूर करनेका उपाय बतलाते हैं—
तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः ॥३२॥
'उनको दूर करनेके लिये एक तत्त्वका अभ्यास ( करना चाहिये )। '
व्याख्या—उपर्युक्त दोनों प्रकारके विघ्नोंका नाश ईश्वर-प्रणिधानसे तो होता ही है, उसके सिवा यह दूसरा उपाय बतलाया गया है। भाव यह कि किसी एक वस्तुमें चित्तको स्थित करनेका बार-बार प्रयत्न करनेसे भी एकाग्रता उत्पन्न होकर विघ्नोंका नाश हो जाता है; अतः यह साधन भी किया जा सकता है ॥३२॥
सम्बन्ध—चित्तके अंदर राग-द्वेषादि मल रहनेके कारण मलिन चित्त स्थिर नहीं होता; अतः चित्तको निर्मल बनानेका सुगम उपाय बतलाते हैं—
समाधिपाद-१ २७
मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्य-
विषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम् ॥३३॥
'सुखी, दुःखी, पुण्यात्मा और पापात्मा—ये चारों जिनके क्रमसे विषय हैं, ऐसी मित्रता, दया, प्रसन्नता और उपेक्षाकी भावनासे चित्त स्वच्छ हो जाता है।'
व्याख्या—सुखी मनुष्योंमें मित्रताकी भावना करनेसे, दुखी मनुष्योंमें दयाकी भावना करनेसे, पुण्यात्मा पुरुषोंमें प्रसन्नताकी भावना करनेसे और पापियोंमें उपेक्षाकी भावना करनेसे चित्तके द्वेष, घृणा, ईर्ष्या और क्रोध आदि मलोंका नाश होकर चित्त शुद्ध—निर्मल हो जाता है। अतः साधकको इसका अभ्यास करना चाहिये ॥३३॥
सम्बन्ध—चित्तशुद्धिका दूसरा उपाय बतलाते हैं—
प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य ॥३४॥
'अथवा प्राणवायुको बारंबार बाहर निकालने और रोकनेके अभ्याससे भी चित्त निर्मल हो जाता है।'
व्याख्या—बारंबार प्राणवायुको शरीरसे बाहर निकालनेके अभ्याससे तथा यथाशक्ति बाहर रोके रखनेका अभ्यास करनेसे मनमें निर्मलता आ जाती है, इससे शरीरकी नाड़ियोंका मल भी नष्ट होता है ॥३४॥
सम्बन्ध—प्रसङ्गवश चित्तकी निर्मलताके उपाय बतलाकर अब मनको स्थिर करनेवाला अन्य हेतु बतलाते हैं—
२८ पातञ्जलयोगदर्शन
विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धनी ॥ ३५॥
'विषयवाली प्रवृत्ति उत्पन्न होकर वह भी मनकी स्थितिको बाँधनेवाली हो जाती है।'
व्याख्या—अभ्यास करते-करते साधकको दिव्य विषयोंका साक्षात् हो जाता है, उन दिव्य विषयोंका अनुभव करनेवाली वृत्तिका नाम विषयवती प्रवृत्ति है। ऐसी प्रवृत्ति उत्पन्न होनेसे साधकका योगमार्गमें विश्वास और उत्साह बढ़ जाता है; इस कारण यह आत्मचिन्तनके अभ्यासमें भी मनको स्थिर करनेमें हेतु बन जाती है ॥३५॥
सम्बन्ध—इसी प्रकारका और भी हेतु बतलाते हैं—
विशोका वा ज्योतिष्मती ॥ ३६॥
'इसके सिवा (यदि) शोकरहित ज्योतिष्मती प्रवृत्ति (उत्पन्न हो जाय तो वह) भी मनकी स्थिति करनेवाली होती है।'
व्याख्या—अभ्यास करते-करते साधकको यदि शोकरहित प्रकाशमय प्रवृत्तिका अनुभव हो जाय तो वह भी मनको स्थिर करनेवाली होती है ॥३६॥
सम्बन्ध—अब चित्तकी स्थिरताका अन्य उपाय बतलाते हैं—
वीतरागविषयं वा चित्तम् ॥ ३७॥
'वीतरागको विषय करनेवाला चित्त भी (स्थिर हो जाता है)।'
समाधिपाद-१ २९
**व्याख्या—**जिन पुरुषोंके राग-द्वेष सर्वथा नष्ट हो चुके हैं, ऐसे विरक्त पुरुषोंको ध्येय बनाकर अभ्यास करनेवाला चित्त भी स्थिर हो जाता है ॥३७॥
**सम्बन्ध—**और भी अन्य उपाय बतलाते हैं—
स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं वा ॥३८॥
'स्वप्न और निद्राके ज्ञानका अवलम्बन करनेवाला चित्त भी स्थिर हो सकता है।'
**व्याख्या—**स्वप्नमें कोई अलौकिक अनुभव हुआ हो, जैसे अपने इष्टदेवका दर्शन आदि, तो उसको स्मरण करके वैसा ही अभ्यास करनेसे मन स्थिर हो जाता है तथा गाढ़ निद्रामें केवल चित्तकी वृत्तियोंके अभावका ही ज्ञान रहता है, किसी भी पदार्थकी प्रतीति नहीं होती, उसी प्रकार समस्त वृत्तियोंका बाध करके वृत्तियोंके अभावके ज्ञानका अवलम्बन करनेसे अर्थात् उसीको लक्ष्य बनाकर अभ्यास करनेसे भी अनायास ही चित्त स्थिर हो सकता है। जिस कालमें तमोगुणका आविर्भाव होता हो, उस समय यह अभ्यास नहीं करना चाहिये। जिस समय चित्त और इन्द्रियोंमें सत्त्वगुण बढ़ा हुआ हो, उस समय यह साधन अधिक लाभप्रद हो सकता है ॥३८॥
**सम्बन्ध—**मनुष्योंकी रुचि भिन्न-भिन्न होती है; अतः अब सर्वसाधारणके उपयोगी साधनका वर्णन करते हुए इस प्रकरणका उपसंहार करते हैं—
| ३० | पातञ्जलयोगदर्शन |
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यथाभिमतध्यानाद्वा ॥ ३९ ॥
'जिसको जो अभिमत हो, उसके ध्यानसे भी मन स्थिर हो जाता है।'
व्याख्या—उपर्युक्त साधनोंमेंसे कोई साधन किसी साधकके अनुकूल नहीं पड़ता हो तो उसे अपनी रुचिके अनुसार अपने इष्टका ध्यान करना चाहिये। अपनी रुचिके अनुसार अपने इष्टका ध्यान करनेसे भी मन स्थिर हो जाता है ॥ ३९॥
सम्बन्ध—चित्तकी स्थिरताके उपाय बतलाकर अब यह बतलाते हैं कि चित्तमें जब स्थिर होनेकी योग्यता परिपक्व हो जाती है, तब उसकी कैसी स्थिति होती है—
परमाणुपरममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः ॥ ४० ॥
'(उस समय) इसका परमाणुसे लेकर परम महत्त्वतक वशीकार हो जाता है।'
व्याख्या—अभ्यास करते-करते जब साधकका चित्त भलीभाँति स्थितिकी योग्यता प्राप्त कर लेता है, उस समय साधक अपने चित्तको सूक्ष्म-से-सूक्ष्म पदार्थसे लेकर बड़े-से-बड़े महान् पदार्थतक चाहे जहाँ, चाहे जब तत्काल स्थिर कर सकता है। उसका अपने चित्तपर पूर्ण अधिकार हो जाता है। चित्तमें स्थिर होनेकी योग्यता परिपक्व हो जानेकी पहचान भी यही है ॥४०॥
सम्बन्ध—पहले बतलाये हुए उपायोंसे जब साधकका अपने चित्तपर अधिकार हो जाता है और चित्त अत्यन्त निर्मल होकर उसमें समाधिकी योग्यता आ जाती है, उसके बाद किस प्रकार
समाधिपाद-१ · ३१
क्रमसे संप्रज्ञात और निर्बीज समाधि सिद्ध होती है, उसका वर्णन आरम्भ करते हैं—
क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनतासमापत्तिः ॥४१॥
'जिसकी समस्त बाह्य वृत्तियाँ क्षीण हो चुकी हैं, ऐसे स्फटिकमणिकी भाँति निर्मल चित्तका जो ग्रहीता (पुरुष), ग्रहण (अन्तःकरण और इन्द्रियाँ) और ग्राह्य (पञ्चभूत और विषयों) में स्थित हो जाना और तदाकार हो जाना है, यही संप्रज्ञात समाधि है।'
व्याख्या—पूर्वोक्त अभ्यास करते-करते जब साधकका चित्त स्वच्छ स्फटिकमणिकी भाँति अति निर्मल हो जाता है, जब उसकी ध्येयसे अतिरिक्त बाह्य वृत्तियाँ शान्त हो जाती हैं, उस समय साधक इन्द्रियोंके स्थूल या सूक्ष्म विषयोंको (योग० ३ । ४४) या अन्तःकरण और इन्द्रियोंको (योग० ३ । ४७) अथवा बुद्धिस्थ पुरुषको (योग० ३ । ४९)—जिस किसी भी ध्येयको लक्ष्य बनाकर उसमें अपने चित्तको लगाता है तो वह चित्त उस ध्येय वस्तुमें स्थित होकर तदाकार हो जाता है। इसीको संप्रज्ञात समाधि कहते हैं; क्योंकि इस समाधिमें साधकको ध्येय वस्तुके स्वरूपका भली प्रकार ज्ञान हो जाता है, उसके विषयमें किसी प्रकारका संशय या भ्रम नहीं रहता।*
* इसी समाधिका वर्णन पहले सतरहवें सूत्रमें भी आया है, वहाँ वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता—इन चारोंके सम्बन्धसे होनेवाले योगको संप्रज्ञात बतलाया है।
३२ पातञ्जलयोगदर्शन
सूत्रकारने अगले सूत्रोंमें न तो आनन्दानुगत समाधिकी चर्चा की है, न ग्रहण या इन्द्रियानुगतकी और न अस्मिता या पुरुषानुगतकी; इस कारण यद्यपि यह विषय स्पष्ट नहीं होता, परन्तु सूक्ष्म विषयकी हद अलिङ्गपर्यन्त बतला दी, इससे मन, इन्द्रियाँ और अस्मिताका उसीमें अन्तर्भाव माना जा सकता है। सम्भव है, इसीसे उन्होंने इन्द्रियानुगत और अस्मितानुगत समाधिके भेदोंका अलग वर्णन न किया हो; क्योंकि तीसरे पादके ४४ वें, ४७ वें और ४९ वें सूत्रमें जहाँ ग्राह्यविषयक, ग्रहण-विषयक और ग्रहीतृविषयक संयमका फल बताया है, वहाँ ग्राह्यके सूक्ष्मरूपमें तन्मात्राओंको और ग्रहणके सूक्ष्मरूपमें अस्मिताको ले लिया है। आनन्द भी मनका ग्राह्य विषय होनेके कारण इसको भी सूक्ष्म ग्राह्यविषयक समाधिके ही अन्तर्गत माना जा सकता है।*
अतः यहाँ यह मानना उचित मालूम होता है कि आकाशादि पञ्च महाभूत और उनका कार्य तो स्थूल ग्राह्य विषय है तथा तन्मात्रा और उनका सूक्ष्म कार्य सूक्ष्म ग्राह्य विषय है। इन्द्रियाँ और अन्तःकरण ग्रहणविषयक समाधिके
* कुछ टीकाकारोंका कहना है कि वितर्क और विचारके स्थानपर तो यहाँ 'ग्राह्य' शब्द है, आनन्दकी जगह 'ग्रहण' शब्द है और अस्मिताकी जगह 'ग्रहीता' शब्द है। दोनों स्थलोंके वर्णनकी एकता करनेके लिये उन लोगोंने उस सूत्रकी टीकामें आनन्दका अर्थ इन्द्रियाँ किया है और इस सूत्रमें 'ग्रहीता' का अर्थ अस्मिता किया है; किंतु व्यासभाष्यमें ऐसा नहीं किया गया है। उन्होंने वहाँ आनन्दका अर्थ आह्लाद और यहाँ 'ग्रहीता' का अर्थ साधारण पुरुष और मुक्त पुरुष—इस प्रकार किया है।
समाधिपाद-१ ३३
अन्तर्गत हैं, वे ग्राह्यविषयक समाधिमें तो नहीं आते; परंतु सूक्ष्म विषयकी हद अलिङ्गपर्यन्त बतला देनेसे ग्रहणविषयक समाधिका भी विचारानुगत समाधिमें ही अन्तर्भाव है। इसी प्रकार आनन्द नाम आह्लादका है। यह प्रकृति और पुरुषके संयोगसे उत्पन्न होनेवाला और मनके द्वारा ग्राह्य है। अतः वह सूक्ष्म विषयके अन्तर्गत आ जानेके कारण उसका भी ग्राह्य समाधिमें अन्तर्भाव है। एवं यहाँ जो गृहीतृविषयक समाधि बतायी गयी है, वह भी तीसरे पादके पैंतीसवें सूत्रके अनुसार प्रकृति-पुरुषके संयोग-कालमें ही पुरुषके स्वरूपमें की जाती है। अतः वह भी अस्मितानुगत समाधि ही है; क्योंकि उसका फल उसी सूत्रमें पुरुषका ज्ञान बतलाया गया है ॥४१॥
सम्बन्ध— सामान्यरूपसे संप्रज्ञात समाधिका स्वरूप बतला दिया, अब इसके भेदोंका वर्णन करते हैं—
तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः ॥४२॥
'उनमें शब्द, अर्थ और ज्ञान—इन तीनोंके विकल्पोंसे संकीर्ण—मिली हुई समाधि सवितर्क है।'
व्याख्या— ग्राह्य यानी मन और इन्द्रियोंद्वारा ग्रहण करनेमें आनेवाले पदार्थ दो प्रकारके होते हैं—(१) स्थूल, (२) सूक्ष्म। इनमेंसे किसी एक स्थूल पदार्थको लक्ष्य बनाकर उसके स्वरूपको जाननेके लिये जब योगी अपने चित्तको उसमें लगाता है, तब पहले-पहल होनेवाले अनुभवमें उस वस्तुके नाम, रूप और ज्ञानके विकल्पोंका मिश्रण रहता है। अर्थात् उसके स्वरूपके
पा० यो० द० ३—