पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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सूत्रकारने अगले सूत्रोंमें न तो आनन्दानुगत समाधिकी चर्चा की है, न ग्रहण या इन्द्रियानुगतकी और न अस्मिता या पुरुषानुगतकी; इस कारण यद्यपि यह विषय स्पष्ट नहीं होता, परन्तु सूक्ष्म विषयकी हद अलिङ्गपर्यन्त बतला दी, इससे मन, इन्द्रियाँ और अस्मिताका उसीमें अन्तर्भाव माना जा सकता है। सम्भव है, इसीसे उन्होंने इन्द्रियानुगत और अस्मितानुगत समाधिके भेदोंका अलग वर्णन न किया हो; क्योंकि तीसरे पादके ४४ वें, ४७ वें और ४९ वें सूत्रमें जहाँ ग्राह्यविषयक, ग्रहण-विषयक और ग्रहीतृविषयक संयमका फल बताया है, वहाँ ग्राह्यके सूक्ष्मरूपमें तन्मात्राओंको और ग्रहणके सूक्ष्मरूपमें अस्मिताको ले लिया है। आनन्द भी मनका ग्राह्य विषय होनेके कारण इसको भी सूक्ष्म ग्राह्यविषयक समाधिके ही अन्तर्गत माना जा सकता है।*
अतः यहाँ यह मानना उचित मालूम होता है कि आकाशादि पञ्च महाभूत और उनका कार्य तो स्थूल ग्राह्य विषय है तथा तन्मात्रा और उनका सूक्ष्म कार्य सूक्ष्म ग्राह्य विषय है। इन्द्रियाँ और अन्तःकरण ग्रहणविषयक समाधिके
* कुछ टीकाकारोंका कहना है कि वितर्क और विचारके स्थानपर तो यहाँ 'ग्राह्य' शब्द है, आनन्दकी जगह 'ग्रहण' शब्द है और अस्मिताकी जगह 'ग्रहीता' शब्द है। दोनों स्थलोंके वर्णनकी एकता करनेके लिये उन लोगोंने उस सूत्रकी टीकामें आनन्दका अर्थ इन्द्रियाँ किया है और इस सूत्रमें 'ग्रहीता' का अर्थ अस्मिता किया है; किंतु व्यासभाष्यमें ऐसा नहीं किया गया है। उन्होंने वहाँ आनन्दका अर्थ आह्लाद और यहाँ 'ग्रहीता' का अर्थ साधारण पुरुष और मुक्त पुरुष—इस प्रकार किया है।